एमपी में भगोरिया उत्सव की गूंज, D3 फॉर्मूले पर विवाद, परंपरा की रक्षा के लिए आदिवासी समाज का बहिष्कार निर्णय

मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के वालपुर में शुक्रवार को भगोरिया मेले की शुरुआत मांदल की थाप के साथ हुई। दोपहर बढ़ते ही हाट और आसपास की गलियों में बड़ी संख्या में लोग जुटने लगे। पहाड़ी इलाकों से आई आदिवासी युवतियां पारंपरिक गहनों और सजे दुपट्टों के साथ मेले में पहुंचीं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस दिन की तैयारी कई हफ्तों से चल रही थी और खरीदारी के लिए परिवारों ने महीनों से बचत की थी।

इस साल का सबसे बड़ा बदलाव मेले की ध्वनि और माहौल में दिखा। तेज डीजे और शराब की मौजूदगी की जगह मांदल, ढोल और पारंपरिक नृत्य केंद्र में रहे। वालपुर में इस बार D3 फार्मूले के साथ आयोजन हुआ, जिसे जिला प्रशासन और स्थानीय युवाओं ने मिलकर आगे बढ़ाया। D3 का सीधा मतलब तय किया गया: न दारू, न दहेज, न डीजे।

आयोजन से जुड़े लोगों का कहना है कि उद्देश्य भगोरिया की पारंपरिक पहचान को मजबूत करना था। मेले में लोगों की भागीदारी पहले की तरह बड़ी रही, लेकिन जोर इस बात पर रहा कि उत्सव का केंद्र लोक वाद्य, सामुदायिक मिलन और पारंपरिक रीति बने, न कि शोर और नशा। इसी वजह से स्थानीय स्तर पर इसे केवल हाट का दिन नहीं, सामाजिक संदेश का अवसर भी माना गया।

गैर निकली तो हाट की ओर बढ़ी हजारों की भीड़

वालपुर की संकरी गलियों में जब गैर निकली, तो बड़ी संख्या में लोग ढोल-मांदल की थाप पर साथ चलने लगे। स्थानीय बोलचाल में गैर को जुलूस कहा जाता है। अलग-अलग गांवों से लोग ट्रैक्टर, जीप और बसों से पहुंचे। कई जगह बसों की छतों पर भी युवा बैठे दिखे, जबकि परिवारों के समूह सीधे हाट की ओर बढ़ते रहे।

मेले में पहुंचे भेरूलाल ने बताया कि उनके साथ 12 रिश्तेदार आए हैं और वे हर साल अलग-अलग भगोरिया हाट में शामिल होते हैं।

“हम हर मेले में जाते हैं, देर हो जाए तो असली मजा निकल जाता है।” — भेरूलाल

स्थानीय कारोबारियों के लिए भी यह दिन अहम रहा। कपड़े, गहने, घरेलू सामान और खानपान की दुकानों पर लगातार भीड़ बनी रही। हालांकि इस बार चर्चा खरीदारी से ज्यादा आयोजन के नए अनुशासन और D3 संदेश पर रही।

रील, सोशल मीडिया और परंपरा साथ-साथ

मेले में एक तरफ तीन पीढ़ियां पारंपरिक नृत्य में शामिल दिखीं, तो दूसरी तरफ युवा सोशल मीडिया के लिए वीडियो और रील बनाते नजर आए। 18 वर्षीय महेश सेल्फी स्टिक के साथ दोस्तों के बीच वीडियो रिकॉर्ड करते दिखे। युवाओं का कहना रहा कि वे उसी दिन कंटेंट Instagram और Facebook जैसे प्लेटफॉर्म पर डाल देते हैं, जिसे शहरों में रहने वाले रिश्तेदार भी देखते हैं।

रीतु भिलाला अपनी पांच बहनों के साथ एक जैसे रंग के परिधानों में मेले में पहुंचीं। उन्होंने बताया कि कपड़ों के रंग और गहनों की तैयारी पहले से तय की जाती है, ताकि समूह में एकरूपता दिखे और पारंपरिक पहनावे की पहचान बनी रहे।

“हम हफ्तों पहले से शेड्स मैच करते हैं और गहने चमकाते हैं।” — रीतु भिलाला

वालपुर का यह मॉडल अब जिले के दूसरे हिस्सों में भी चर्चा में है, क्योंकि इसमें सांस्कृतिक उत्सव, युवा भागीदारी और सामाजिक सुधार तीनों को एक साथ रखा गया है। प्रशासनिक सहयोग और समुदाय की सहमति से चलाया गया D3 संदेश इस बात का उदाहरण बना कि बड़े लोक उत्सवों में भी परंपरा और अनुशासन को साथ लेकर चला जा सकता है।

कुल मिलाकर, इस बार वालपुर का भगोरिया भीड़, भागीदारी और सांस्कृतिक ऊर्जा के लिहाज से सक्रिय रहा, लेकिन उसकी पहचान सिर्फ उत्सव तक सीमित नहीं रही। D3 फार्मूले ने इसे स्थानीय समाज में व्यवहार बदलने की पहल से भी जोड़ा, जहां लोक परंपरा को संरक्षित करते हुए नई पीढ़ी को सीधे शामिल किया गया।