Ujjain News: ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते युद्ध के तनाव ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को हिलाकर रख दिया है, जिसका सीधा असर अब धार्मिक नगरी उज्जैन की रसोई तक पहुँच गया है।
देशभर में गैस आपूर्ति बाधित होने के कारण उज्जैन में कमर्शियल गैस सिलेंडरों की सप्लाई लगभग ठप हो गई है। इस संकट ने रेस्टोरेंट संचालकों को दशकों पीछे धकेल दिया है, जहाँ अब गैस चूल्हों की जगह पारंपरिक डीजल और लकड़ी की भट्टियों ने ले ली है।
महीने में एक बिकती थी, अब रोजाना तीन की मांग
गैस के विकल्प के रूप में डीजल भट्टी की मांग में अचानक आए इस उछाल ने स्थानीय निर्माताओं को चकित कर दिया है। सूत्रो के मुताबिक ढांचा भवन स्थित डायमंड फैक्ट्री में गैस के दौर में डीजल भट्टी का काम लगभग बंद हो चुका था। महीने भर में बमुश्किल एक ग्राहक आता था, लेकिन पिछले दो दिनों से स्थिति बदल गई है। अब रोजाना 3 से 4 भट्टियां बिक रही हैं और दर्जनों लोग पूछताछ के लिए आ रहे हैं।
10 से 15 दिन की लंबी वेटिंग
उज्जैन के ढांचा भवन, अवन्तीपुरा, कोयला फाटक और ढाबा रोड स्थित फैक्ट्रियों में काम का बोझ इतना बढ़ गया है कि ग्राहकों को 10 से 15 दिन की वेटिंग दी जा रही है। इस देरी के पीछे दो मुख्य कारण हैं:
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एकदम बढ़ी डिमांड: अचानक आए थोक ऑर्डर्स को पूरा करने के लिए फैक्ट्रियों के पास पर्याप्त स्टॉक नहीं है।
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कारीगरों की कमी: वर्तमान में रमजान का महीना चलने के कारण अधिकांश कारीगर रोजे से हैं। वे सुबह 10 से शाम 6 बजे तक ही काम कर पा रहे हैं, जिससे उत्पादन की गति धीमी हो गई है।
लाखों श्रद्धालुओं के भोजन पर संकट
उज्जैन में प्रतिदिन लगभग डेढ़ लाख श्रद्धालु महाकाल मंदिर के दर्शन करने पहुँचते हैं। शहर के करीब 700 रेस्टोरेंट, जो मुख्य रूप से महाकाल मंदिर, रेलवे स्टेशन, फ्रीगंज और बस स्टैंड क्षेत्रों में स्थित हैं, कमर्शियल सिलेंडर पर निर्भर थे। सप्लाई बंद होने से इन रेस्टोरेंट संचालकों के सामने कारोबार बंद करने की नौबत आ गई है। यही कारण है कि 75 प्रतिशत संचालक अब 20 से 22 हजार रुपये खर्च कर डीजल भट्टी बनवा रहे हैं, जबकि कुछ लोग लकड़ी की बड़ी भट्टियों (कीमत 60 हजार से 1.5 लाख तक) का रुख कर रहे हैं।
घरों में बढ़ी ‘इंडक्शन’ की धूम
गैस की किल्लत केवल व्यापारिक प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं है। घरेलू गैस सिलेंडर की अनिश्चितता को देखते हुए आम नागरिक अब इलेक्ट्रिक इंडक्शन की ओर भाग रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स व्यापारियों के अनुसार:
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पहले रोजाना 3 से 5 इंडक्शन बिकते थे।
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अब यह आंकड़ा बढ़कर 20 से 25 प्रतिदिन पहुँच गया है।
विशेष नोट: युद्ध के चलते ईंधन की कीमतों और उपलब्धता में अस्थिरता बनी हुई है। प्रशासन स्थिति पर नज़र रखे हुए है, लेकिन फिलहाल वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत ही उज्जैन की ‘रसोई’ को चालू रखने का एकमात्र सहारा नजर आ रहे हैं।