Metro Project: इंदौर में महत्वाकांक्षी मेट्रो प्रोजेक्ट अब कानूनी विवादों के घेरे में आ गया है। शहर के छोटे गणपति क्षेत्र में प्रस्तावित अंडरग्राउंड मेट्रो स्टेशन के निर्माण को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इस याचिका में निर्माण प्रक्रिया को ‘अवैध’ बताते हुए इस पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है।
निजी संपत्ति और मुआवजे का मुख्य विवाद
सूत्रो के अनुसार बताया जा रहा है कि इंदौर निवासी महेश राठी द्वारा दायर इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि मेट्रो कॉर्पोरेशन लगभग 125 से 140 फीट की गहराई तक खुदाई करने की योजना बना रहा है। यह खुदाई निजी संपत्तियों और एक सार्वजनिक पार्क के नीचे से होकर गुजरेगी।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अभिनव धनोतकर के अनुसार, भूमि अधिग्रहण कानून 2013 स्पष्ट करता है कि जमीन के मालिक का हक केवल ऊपरी सतह तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि उसकी मिट्टी और गहराई पर भी होता है। बिना किसी औपचारिक भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया या मुआवजा दिए निजी जमीन के नीचे खुदाई करना, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत दिए गए संपत्ति के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
पर्यावरण और भूजल पर मंडराता खतरा
गौरतलब है कि इस याचिका में केवल कानूनी ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चिंताओं को भी प्रमुखता से उठाया गया है। निर्माण स्थल के ऊपर स्थित सार्वजनिक पार्क में लगभग 100 से 200 विशाल पेड़ मौजूद हैं। इतनी अधिक गहराई तक खुदाई होने से इन पेड़ों की जड़ों को नुकसान पहुँच सकता है, जिससे पर्यावरण संतुलन बिगड़ने का डर है।
साथ ही, याचिका में निम्नलिखित तकनीकी पहलुओं पर सवाल उठाए गए हैं:
पारदर्शिता की कमी: प्रोजेक्ट के लिए अब तक कोई पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है।
इमारतों की सुरक्षा: घनी आबादी वाले इस क्षेत्र में गहरी खुदाई से आसपास के पुराने मकानों और व्यावसायिक इमारतों की नींव कमजोर होने और उनकी संरचनात्मक सुरक्षा को खतरा होने की आशंका जताई गई है।
भूजल स्तर: इस निर्माण कार्य से क्षेत्र के वॉटर टेबल (भूजल स्तर) पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है।
इन विभागों को बनाया गया पक्षकार
मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका में राज्य सरकार, मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, इंदौर नगर निगम, जिला कलेक्टर, मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और भारत संघ को पक्षकार बनाया गया है।
आगे क्या?
याचिकाकर्ता की मांग है कि जब तक जमीन का विधिवत अधिग्रहण नहीं किया जाता और पर्यावरणीय मंजूरी की पारदर्शी प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक खुदाई और निर्माण कार्य पर रोक लगाई जाए। अब सबकी निगाहें हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ यह तय होगा कि विकास की इस रफ्तार में कानूनी और पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी हुई है या नहीं।