रुपये में ऐतिहासिक गिरावट: ईरान-इजराइल युद्ध के बीच ₹92.62 के ‘ऑल-टाइम लो’ पर पहुंचा

Dollar vs Rupee: वैश्विक राजनीति में बढ़ते तनाव और ईरान-इजराइल युद्ध की आहट ने भारतीय मुद्रा की कमर तोड़ दी है। गुरुवार, 19 मार्च 2026 को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरकर ₹92.62 के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर (All-time Low) पर पहुंच गया।

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से पैसा निकालने के कारण रुपये पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

अगले साल तक ₹95 का स्तर छू सकता है डॉलर

दिग्गज वैश्विक वित्तीय संस्था गोल्डमैन सैक्स ने रुपये के भविष्य को लेकर चिंताजनक अनुमान जताया है। गोल्डमैन सैक्स के अनुसार, दक्षिण एशियाई देशों की मुद्राओं में भारतीय रुपया इस समय सबसे कमजोर स्थिति में है। संस्था ने चेतावनी दी है कि यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो अगले साल तक रुपया टूटकर ₹95 प्रति डॉलर के स्तर तक जा सकता है।

रुपये के टूटने के 3 प्रमुख कारण

  1. विदेशी निवेशकों का पलायन: मार्च के महीने में ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार (Equity) से लगभग 5.5 अरब डॉलर निकाल लिए हैं। इस भारी बिकवाली के कारण निफ्टी 50 में करीब 8% की गिरावट आई है।

  2. सप्लाई चेन का संकट: गोल्डमैन सैक्स के भारतीय अर्थशास्त्री शांतनु सेनगुप्ता के मुताबिक, अमेरिका-इजराइल संघर्ष के चलते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) के बंद होने की आशंका है। इससे कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होगी और भारत का आयात बिल बढ़ जाएगा।

  3. करंट अकाउंट डेफिसिट: कच्चे तेल की कीमतों में बढ़त के कारण चालू खाता घाटा (CAD) जीडीपी के 1.2% तक पहुंचने का अनुमान है, जो पहले 0.8% था।

अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा दोहरा असर

मुद्रा के अवमूल्यन का असर केवल आयात पर ही नहीं, बल्कि देश की कुल विकास दर पर भी पड़ेगा। गोल्डमैन सैक्स ने भारत की आर्थिक वृद्धि दर (GDP) के अनुमान को संशोधित करते हुए वित्त वर्ष 2026-27 के लिए इसे 7.0% से घटाकर 6.5% कर दिया है। इसके साथ ही, महंगाई दर में भी 30 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की आशंका जताई गई है।

RBI का हस्तक्षेप

बाजार में मचे इस हड़कंप को थामने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) सक्रिय हो गया है। रुपया और ज्यादा न गिरे, इसके लिए आरबीआई ने पिछले एक हफ्ते में ही बाजार में करीब 18 से 20 अरब डॉलर की भारी बिक्री की है। हालाकि, वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये को संभालना फिलहाल एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी।