नई दिल्ली: पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने भारतीय बाजारों और आम आदमी की जेब पर सीधा हमला बोल दिया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और कॉमर्शियल एलपीजी की भारी किल्लत ने देश के औद्योगिक पहिये को जाम करना शुरू कर दिया है।
इसका सबसे बड़ा असर रोजमर्रा के सामान, पैकेजिंग इंडस्ट्री और मेडिकल सेक्टर पर पड़ने जा रहा है। आने वाले दिनों में दूध, किराना और इलाज के खर्चों में भारी बढ़ोतरी की आशंका है।
प्लास्टिक उद्योग की टूटी कमर: 70% तक महंगा हुआ कच्चा माल
जंग के कारण प्लास्टिक उद्योग सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। पिछले 30 दिनों में कच्चे माल की कीमतों में 50 से 70% तक का उछाल आया है।
दामों में आग: सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला ‘एलडीपीई’ (LDPE) प्लास्टिक दाना, जो ₹110 प्रति किलो था, अब ₹180 तक पहुंच गया है। अन्य पॉलीमर की कीमतों में भी ₹30,000 से ₹70,000 प्रति टन की वृद्धि हुई है।
असर: अप्रैल से प्लास्टिक की टंकियों और कंटेनरों के दाम 30-40% तक बढ़ सकते हैं। ऑल इंडिया प्लास्टिक मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अनुसार, इस संकट से जुड़े 5 लाख लोगों में से करीब 3 लाख के बेरोजगार होने का खतरा मंडरा रहा है।
ईंधन संकट: 20 हजार फैक्ट्रियां बंद, गैस की किल्लत
देशभर में कॉमर्शियल एलपीजी की कमी ने उत्पादन को ठप कर दिया है।
उत्पादन ठप: अनुमान है कि देशभर की 50 हजार प्लास्टिक फैक्ट्रियों में से लगभग 20 हजार इकाइयां बंद हो चुकी हैं। गुजरात के राजकोट, मध्य प्रदेश, रायपुर और हैदराबाद जैसे औद्योगिक केंद्रों में सन्नाटा पसरा है।
ब्लैक मार्केटिंग की आशंका: निर्माता बता रहे हैं कि जो गैस ₹80 प्रति किलो मिलती थी, वह अब ₹150 में भी उपलब्ध नहीं है। बिना गैस के उत्पादन संभव नहीं है, जिसके चलते पुराने ऑर्डर रद्द किए जा रहे हैं।
बदल रही है रसोई की सूरत: ‘रेडी-टू-ईट’ का बढ़ा क्रेज
सिलेंडर की कमी और प्रवासी कामगारों के घर लौटने से शहरी परिवारों ने खाना पकाने का तरीका बदल लिया है।
क्विक कॉमर्स का उछाल: बिगबॉस्केट और अमेजन जैसे प्लेटफॉर्म्स पर ‘रेडी-टू-ईट’ (Instant Food) की मांग में 10% से ज्यादा की वृद्धि हुई है। लोग अब इंडक्शन कुकटॉप और ऐसे उत्पादों की ओर भाग रहे हैं जो गैस की 60% तक बचत करते हों।
अमेजन का स्पेशल स्टोर: बढ़ती मांग को देखते हुए अमेजन इंडिया ने एक समर्पित ‘रेडी टू ईट स्टोर’ शुरू किया है, जहाँ नूडल्स, जूस और प्रोटीन स्नैक्स की बिक्री में ‘उल्लेखनीय वृद्धि’ दर्ज की गई है।
सीमेंट और निर्माण क्षेत्र पर दबाव
कच्चे तेल की कीमतों का असर सीमेंट की बोरियों (पॉलीप्रोपाइलीन) और परिवहन पर भी पड़ा है।
लागत में वृद्धि: विशेषज्ञों के अनुसार, उत्पादन लागत में ₹150 से ₹200 प्रति टन की बढ़ोतरी हुई है।
कीमतों की कशमकश: कंपनियों ने प्रति बोरी ₹15-20 बढ़ाने की कोशिश की थी, लेकिन बाजार में अत्यधिक सप्लाई के कारण उन्हें यह बढ़ोतरी वापस लेनी पड़ी। हालांकि, उत्तर भारत में अभी भी ₹10-15 की बढ़त बरकरार है।
उद्योग जगत की सरकार से मांग
संकट को देखते हुए प्लास्टिक एसोसिएशन ने सरकार से गुहार लगाई है कि स्थिति सामान्य होने तक प्लास्टिक उत्पादों पर GST को 18% से घटाकर 5% किया जाए। साथ ही बैंकों से वर्किंग कैपिटल लिमिट 20% तक बढ़ाने की मांग की गई है ताकि कैश फ्लो की समस्या से जूझ रही छोटी यूनिट्स को राहत मिल सके।
निष्कर्ष: यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ, तो आने वाले हफ्तों में बोतलबंद पानी, खाद्य तेल, नमक और यहाँ तक कि मेडिकल उपकरणों (नॉन-सर्जिकल) की कीमतें आम आदमी के बजट को बिगाड़ सकती हैं।