Ujjain News: मध्य प्रदेश में इन दिनों स्वामी हर्षानंद गिरि (पूर्व नाम हर्षा रिछारिया) के संन्यास को लेकर घमासान मचा हुआ है। उज्जैन के मौनी तीर्थ आश्रम में महामंडलेश्वर सुमनानंदजी महाराज से दीक्षा लेकर संन्यास पथ पर कदम रखने वाली हर्षा रिछारिया के खिलाफ संत समाज के एक धड़े ने मोर्चा खोल दिया है। अब इस विवाद पर पलटवार करते हुए स्वामी हर्षानंद गिरि ने सोशल मीडिया पर एक भावुक और तीखा वीडियो जारी कर अपनी चुप्पी तोड़ी है।
अपमान और अग्निपरीक्षा का डेढ़ साल
हर्षा रिछारिया, जो महाकुंभ 2025 के दौरान सुर्खियों में आई थी, उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो में भावुक होते हुए कहा कि वह पिछले डेढ़ साल से अपमान के घूंट पी रही हैं। उन्होंने इसे अपनी ‘अग्निपरीक्षा’ बताते हुए कहा, “मैं अब मानसिक रूप से इतनी मजबूत हो चुकी हूं कि कोई भी विरोध मुझे विचलित नहीं कर सकता। अगर भगवान राम ने मेरी किस्मत में संन्यास का मार्ग लिखा है, तो दुनिया की कोई भी शक्ति इसे रोक नहीं सकती।”
इतिहास और पौराणिक उदाहरणों से दिया जवाब
संन्यास पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने मीरा, जीसस, बुद्ध और माता सीता का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा:
युगों का सत्य: हर युग में सत्य और भक्ति के मार्ग पर चलने वालों का विरोध हुआ है। नारी को हमेशा अपनी पवित्रता और इरादों की परीक्षा देनी पड़ी है।
वाल्मीकि का तर्क: संतों के इस तर्क पर कि संन्यास बचपन में लिया जाना चाहिए, उन्होंने महर्षि वाल्मीकि का उदाहरण देते हुए कहा कि सनातन धर्म में परिवर्तन कभी भी संभव है। यदि डाकू से महर्षि बना जा सकता है, तो किसी भी आयु में संन्यास क्यों नहीं लिया जा सकता?
संत समाज की भाषा पर उठाए सवाल
हर्षा ने मध्य प्रदेश संत समिति के अध्यक्ष महाराज अनिलानंद के बयानों पर गहरी नाराजगी जताई। उन्होंने पूछा कि क्या एक महिला के लिए अभद्र शब्दों का प्रयोग करना संतों की मर्यादा के अनुकूल है? उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग केवल ‘वायरल’ होने और प्रसिद्धि पाने के लिए उन्हें निशाना बना रहे हैं। उन्होंने संत समाज से अपील की कि वे युवाओं को धर्म से जोड़ें, न कि विवाद पैदा कर उन्हें धर्म से विमुख करें।
विवाद की जड़: क्या है महाराज अनिलानंद का आरोप?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब मध्य प्रदेश संत समिति के अध्यक्ष महाराज अनिलानंद ने हर्षा के संन्यास को ‘मर्यादा के विपरीत’ बताया। उन्होंने तीखा हमला करते हुए कहा कि – “900 चूहे खाकर बिल्ली हज को नहीं जा सकती। हर्षा ने पूर्व में सनातन धर्म के खिलाफ अपमानजनक बातें कही थीं, ऐसे में उनका संन्यास स्वीकार्य नहीं है।”
अनिलानंद ने उन महाराज (सुमनानंदजी) की भी जांच की मांग की है जिन्होंने हर्षा को दीक्षा दिलाई।
“होइहि सोइ जो राम रचि राखा”
अपने वीडियो के अंत में स्वामी हर्षानंद गिरि ने ईश्वर पर अटूट विश्वास जताते हुए कहा कि उनका मार्ग किसी व्यक्ति ने नहीं, बल्कि स्वयं ईश्वर ने निर्धारित किया है। उन्होंने रामचरितमानस की चौपाई का उल्लेख करते हुए स्पष्ट कर दिया कि वह पीछे हटने वाली नहीं हैं और उनका भविष्य अब पूरी तरह से अध्यात्म को समर्पित है।
निष्कर्ष…
यह विवाद केवल एक महिला के संन्यास का नहीं, बल्कि परंपरा बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बहस बन गया है। जहाँ एक ओर संत समाज ‘मर्यादा और अतीत’ की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर स्वामी हर्षानंद गिरि इसे अपनी ‘आस्था और अधिकार’ बता रही हैं। उज्जैन की इस धर्म नगरी में शुरू हुआ यह विवाद अब आने वाले समय में क्या मोड़ लेता है, यह देखना अभी बाकी है।