इंदौर “जाम नगरी” मेट्रो दिला पाएंगी मुक्ती? बिना प्लानिंग के 31 कि मी मेट्रो पर 19 हजार करोड रु खर्च

इंदौर। शहर को प्रयोगशाला बना चुके अधिकारी कभी यह नहीं समझ पाएंगे कि विकास की दुर दृष्टि के कैसी होना चाहिए। अधिकारी जब प्लान बनाते है तो आज का मुल्याकंन करते है। जबकि किसी भी योजना को बनाने के लिए दुरदृष्टि की आवश्यकता होती है। ऐसा ही नजारा इंदौर शहर में देखा जा रहा है।
नर्मदा चरण दर चरण व सीवरेज Jnnum, अमृत, गंगा एक्शन प्लान लागू करने के उपरांत भी शहर खुदा पड़ा है। 3100 किलोमीटर सड़कों पर 8 सेवाओं में सीवरेज 68% पानी 48% बन पाया है।
8 सेवाओं को फिर से नये सिरे 35 लाख जनसंख्या के लिए फिर से स्थापित करने के लिए 18 हजार करोड़ रुपए चाहिए। इसे छोड़ मात्र 1% मेट्रो रेल नेट वर्क 31 किलोमीटर पर 19 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं। फिर भी इन्दौर शहर जाम नगरी बना हुआ है। एक प्रतिशत मेट्रो चलने से शहर को जाम से मुक्ती मिलेगी यह तो असंभव ही है। लेकिन शहर के विकास को दरकिनार करके सरकार मेट्रो में करोड़ों रूपए फूंक रही है।
शहर के विकास की आवश्यकता पर एक नजर डाले तो शहरी विकास मंत्रालय की रिपोर्ट चार्ट के अनुसार है।

शहर में कुल सड़कों की लंबाई लगभग सवा लाख किलोमीटर से भी अधिक है। जो कि चार्ट में इस प्रकार है।
3100

किलो मीटर निगम सीमा कि कुल सडक है।

2784 किलो मीटर गलीयों कि 30 फिट या इससे छोटी सडके कि है।

316

किलो मीटर मुख्य सडके है।

2100 किलो मीटर प्रायमरी, सेक्रेडरी, सर्विस सीवरेज लाईन है। मात्र 67.74%

1500 किलो मीटर पानी लाईन

है। मात्र 48.39%

उक्त जानकारी देते हुए समाजसेवी किशोर कोड़वानी ने बताया कि विगत दिनों केबिनेट ने 31 कि मी मेट्रो रेल निर्माण के लिए 19 हजार करोड रुपए स्वीकृत किए है। शहर कि मूलभूत 8 सुविधा रोड, पानी, सीवरेज, वर्षा जल निकासी, सफाई, लोक परिवहन, ट्राफिक इंसास्ट्रेक्चर, स्ट्रीट लाइट, सेवा 35 लाख नागरिको कि सुविधा के लिए नये सिरे से निर्माण के लिए 18 हजार करोड व भविष्य के 50 लाख जनसंख्या के लिए 26 हजार करोड रु चाहिए। 1.3% वार्षिक दर वृद्धी जोडकर । लेकिन इन सबको दरकिनार करके सरकार ने सिर्फ मेट्रों पर ही करोड़ो रुपए खर्च कर दिए है। जबकि शहर के विकास के लिए आवश्यक सुविधाएं नहीं है। तो क्या इस एक प्रतिशत मेट्रों से शहर को जाम से मुक्ति मिल पाएंगी इसका जवाब कौन देगा।