घर के चिराग पर बढ़ रहा चश्मे का बोझ, कारण जान कर चौंक जाएंगे आप!

आजकल बच्चों को चश्मा लगने की समस्या बढ़ती जा रही है, और इसका कारण उनकी जीवनशैली में बदलाव और खानपान की आदतें हैं। पहले जहां 40-45 साल की उम्र में चश्मा लगने की बात होती थी, वहीं अब यह समस्या 5-6 साल के बच्चों में भी देखने को मिल रही है। डॉक्टरों का मानना है कि इसके पीछे टीवी और मोबाइल की लत, जंक फूड, और बच्चों की आउटडोर एक्टिविटी में कमी जैसे कारण जिम्मेदार हैं।

5-6 हजार बच्चे मोतियाबिंद के शिकार


नेत्र विशेषज्ञ डॉक्टर हर साल करीब 5,000-6,000 मरीजों का मोतियाबिंद ऑपरेशन कर रहे हैं, जिनमें बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बच्चों का समय अधिकतर घर के अंदर ही गुजरता है, जिससे उनकी आंखों को रोशनी कम मिलती है, और उनकी आंखों पर भी चश्मा चढ़ने लगता है। मौसम के बदलाव के दौरान होती है बच्चों की आंखों में कई समस्याएं जैसे लाली, खुजली, और ड्राइनेस देखने को मिलती हैं। इसके अलावा, यदि समय पर इलाज नहीं किया जाता है, तो यह समस्याएं बच्चों की रोशनी को प्रभावित कर सकती हैं। सर्दियों में ज्यादा समय घर से बाहर न निकलने पर बच्चों की आंखों में नसें फटने लगती हैं, और गर्मी में जलन, खुजली, पानी बहने जैसी समस्याएं होती हैं।

क्या हो रही हैं मुख्य समस्याएं?

  1. मोबाइल और टीवी की लत: बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ने से उनकी आंखों पर बुरा असर पड़ रहा है। पांच-छह घंटे टीवी या मोबाइल देखना उनकी आंखों को थका देता है।
  2. गलत आदतें: बच्चों की पढ़ाई का तरीका भी उनके आंखों पर असर डाल रहा है। बेड पर लेटकर पढ़ने से उनकी आंखों पर अधिक दबाव पड़ता है।
  3. आउटडोर एक्टिविटी की कमी: बच्चों का घर के अंदर अधिक समय बिताना उनकी आंखों के लिए हानिकारक है। सूरज की रोशनी से मिलने वाले विटामिन डी की कमी भी उनकी आंखों की रोशनी को प्रभावित करती है।

डॉक्टर की सलाह: बच्चों को कम से कम 40-45 मिनट सूरज की रोशनी में जरूर रहना चाहिए, और पढ़ाई के दौरान कमरे में सही रोशनी का ध्यान रखना चाहिए। अगर बच्चे स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं तो उनकी आंखों को आराम देना बहुत जरूरी है।