धर्म की आड़ में अधर्म का लायसेंस

अन्ना दुराई
इन दिनों भाव खत्म से प्रतीत हो रहे हैं। संवेदनाएँ मर सी गई है। अहसास नाम की कोई चीज नहीं है। लिखना सुनना सब बेमानी सा हो गया है। कानून को हाथ में लेने वाली कहावत में भी दम नहीं रहा। अब कानून को जूते की नोक पर रखकर चला जाता है। लायसेंस के मायने बदल गए हैं। धर्म और धार्मिकता की आड़ में ये कुछ भी कर गुजरते हैं। पहले पुलिस प्रशासन की निगाहों से बचने के लिए वाहनों पर प्रेस शासन आदि लिखवाकर चला जाता था, लेकिन अब जो शब्द लिखे जा रहे हैं, उन्हें देखकर पुलिस खुद ही उनसे दूर भाग जाती है। बिना किसी डर के गलत से गलत करने का मानों लायसेंस मिल गया है। क्या होगा, क्या नहीं होगा, आप क्या करोगे, क्या नहीं करोगे, क्या सही है, क्या गलत। इसके लिए पुलिस प्रशासन की जरूरत नहीं पड़ती। फैसले यही लोग ले लेते हैं। आजकल आए दिन पुलिस प्रशासन भी पीट जाता है। कई मौकों पर कुछ कर नहीं पाता। सिर्फ मन मसोस कर रह जाता है। और ऐसा क्यों न हो। इसके लिए जिम्मेदार भी वही है। कानून अपना काम करेगा, जैसी लाईन थोथी ही साबित होती है।

हंसी आती है जब धर्म स्थलों की सुरक्षा में पुलिस प्रशासन का समय जाया हुआ पाता हूँ। गली मोहल्ले, चौराहों पर देखते ही देखते अचानक धर्म स्थल प्रकट होते हैं। धार्मिक क्रियाएँ प्रारंभ हो जाती है और भीड़ का जमावड़ा यहाँ शुरू हो जाता है। किसी को नहीं पता कि वे इससे हासिल क्या कर रहे हैं, लेकिन जुटे रहते हैं। हुड़दंगियों के छोटे छोटे समूह अशालीन नारों के साथ गुजर जाते हैं लेकिन पुलिस प्रशासन मूक दर्शक बनकर साथ साथ चलता है। सोशल मीडिया पर सुबह से शाम और रात तक नफरती और भड़काऊ मैसेजों की बाढ़ सी रहती है। पत्रकारों के लिए खबर छापने के नियम कायदे होते हैं लेकिन बगैर किसी टोकाटाकी के गंदे, भ्रामक और झूठे संदेश मोबाईल पर चलते हैं। भेजने वाले का नाम तक दर्ज होता है लेकिन उसके खिलाफ कोई एक्शन नहीं होती

पुलिस प्रशासन की ऐसी क्या लाचारी है, समझ नहीं आती। सब जानते हैं सत्ताधीशों के हाथ में चाबी देकर और उनकी गुलामी करने से खुद उन्होंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। कहीं कुछ घटित हो जाए तो पुलिस प्रशासन पहले इशारे का इंतजार करता है। आने वाले इशारे पर ही सामने वाले का भविष्य टिका होता है। मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए कि तर्ज पर उसके साथ न्याय या अन्याय होता है। कहने से तात्पर्य है कि पुलिस प्रशासन ने हाथ रहकर अपनी गति बिगाड़ी है। इस उधेड़बुन में होता यह है कि कई बार दोषी भी हंसते हुए बाहर निकल जाते हैं और कई बार बेकसूर इनके कोप का शिकार हो जाते हैं। सत्ताधीशों के सामने नतमस्तक होने से उत्पन्न होने वाली झल्लाहट नादानों पर कहर बनकर टूटती है। आजकल धरना प्रदर्शन पर लगाम लगाने की कोशिश होती है लेकिन दूसरी ओर धर्म और धार्मिक आयोजन की व्यवस्था के नाम पर पुलिस प्रशासन का दिन बीत जाता है। उसके पास जन समस्याओं और अन्य सरकारी काम करने का समय नहीं बचता।

धर्म आत्मिक शांति के लिए होता है। हर नागरिक आस्थावान है। घर से पूजन अर्चन, दर्शन वंदन कर बाहर निकलता है। पग पग पर आने वाले धर्म स्थलों के आगे शीष नवाता है। बाहरी तौर पर देखें तो आजकल कई स्थानों पर धर्म के नाम पर जबरदस्ती हो रही है। इतना धर्म हो रहा है तो उसका रिजल्ट भी सामने आना चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं।

शहर में लूट पट्टी की घटनाएँ बढ़ रही है। आए दिन नशे के शिकार युवाओं के समूह आम नागरिकों को धमकाकर पैसे ले जाते हैं। धार्मिक आयोजनों और सुरक्षा देने के नाम पर लाखों की चंदा वसूली हो जाती है। इन पैसों का उपयोग कहाँ और कैसे होता है, आप अच्छे से समझते हैं। खौफ पैदा करना होगा। घमंड और अहंकार को तोड़ना होगा। पुलिस प्रशासन को अपना डंडा बिना किसी भेदभाव के चलाना होगा, नहीं तो आने वाला समय कष्टदायक ही होगा। धर्म के लिए धर्म होगा तो सब सुखी होंगे लेकिन धर्म का उपयोग अधर्म के लिए होने लगा तो स्थिति बद से बदतर ही होगी। धर्म और आस्था के नाम पर दी जाने वाली रियायत अब आपके ही गले पड़ सकती है। धर्म दादागिरी का साधन बनता जा रहा है। विकट परिस्थितियों से बचना हो तो चेतना होगा।