नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने बिहार में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात बिछा दी है। प्रदेश की 40 लोकसभा सीटों में से 30 पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की जीत ने जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा के हौसले बुलंद कर दिए हैं, वहीं तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इस बीच, राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) की ‘जन सुराज’ यात्रा भी एक तीसरे मजबूत विकल्प के रूप में उभर रही है, जिससे 2025 का मुकाबला त्रिकोणीय होने के पूरे आसार हैं।
लोकसभा चुनाव के परिणाम विधानसभा चुनाव के लिए एक मनोवैज्ञानिक बढ़त और जमीनी संकेत देते हैं। इन नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि बिहार की जनता का मौजूदा मूड क्या है और आने वाले समय में राजनीतिक दलों को किन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
लोकसभा नतीजों से NDA उत्साहित
बिहार में एनडीए ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 30 सीटों पर कब्जा किया। इसमें भाजपा और नीतीश कुमार की पार्टी जदयू, दोनों ने 12-12 सीटें जीतीं। चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) ने 5 और जीतन राम मांझी की ‘हम’ ने एक सीट हासिल की। यह प्रदर्शन एनडीए के लिए एक बड़ा बूस्टर है। नीतीश कुमार की एनडीए में वापसी और केंद्र में सरकार गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका ने उनके राजनीतिक कद को और मजबूत किया है। अब एनडीए इसी लय को विधानसभा चुनाव में भी बरकरार रखना चाहेगा।
महागठबंधन के लिए मंथन का दौर
दूसरी ओर, तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन को लोकसभा चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। गठबंधन को सिर्फ 9 सीटों से संतोष करना पड़ा, जिसमें राजद को 4, कांग्रेस को 3 और भाकपा (माले) को 2 सीटें मिलीं। यह परिणाम तेजस्वी यादव के लिए एक बड़ा झटका है, जो लगातार रोजगार और विकास के मुद्दे पर सरकार को घेर रहे थे। अब उन्हें 2025 के लिए अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना होगा और गठबंधन के भीतर नई ऊर्जा का संचार करना होगा।
प्रशांत किशोर का ‘जन सुराज’ फैक्टर
इस चुनावी गणित के बीच प्रशांत किशोर एक महत्वपूर्ण ‘एक्स-फैक्टर’ बनकर उभरे हैं। अपनी ‘जन सुराज’ पदयात्रा के जरिए वे लगातार बिहार के गांव-गांव तक पहुंच रहे हैं। पीके ने घोषणा की है कि विधानसभा चुनाव से पहले वे अपनी इस मुहिम को एक राजनीतिक दल में बदलेंगे और सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे।
प्रशांत किशोर लगातार नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के 30 साल के शासन पर सवाल उठाते रहे हैं और बिहार के लिए एक नए विजन की बात कर रहे हैं। अगर वे एक मजबूत संगठन खड़ा करने में कामयाब होते हैं, तो वे निश्चित रूप से एनडीए और महागठबंधन, दोनों के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं। इससे मुकाबला सीधा न रहकर त्रिकोणीय हो जाएगा, जो चुनाव परिणामों को अप्रत्याशित बना सकता है।
कुल मिलाकर, बिहार का सियासी पारा चढ़ने लगा है। जहां एनडीए अपनी जीत की लय को बनाए रखने की कोशिश करेगा, वहीं तेजस्वी यादव वापसी के लिए जोर लगाएंगे। इन दोनों के बीच प्रशांत किशोर का बढ़ता प्रभाव 2025 के विधानसभा चुनाव को बेहद दिलचस्प और कांटे का बना सकता है।