ब्राह्मण समाज को लेकर की गई टिप्पणी के बाद चर्चा में आए प्रमोटी आईएएस संतोष वर्मा का मामला दिन-ब-दिन और जटिल होता जा रहा है। यह प्रकरण अब केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि इसकी आंच पूरे न्यायिक तंत्र तक पहुंच चुकी है। अब तक इस केस में दो न्यायाधीश निलंबित हो चुके हैं, एक का तबादला किया गया है, एक टाइपिस्ट की गिरफ्तारी हो चुकी है और जिला लोक अभियोजक भी जांच के घेरे में आ गए हैं। खुद संतोष वर्मा की आईएएस पदोन्नति और नौकरी पर संकट गहरा गया है।
किन-किन पर पड़ी आंच
इस पूरे मामले में कई अहम किरदार सामने आए हैं, जिनकी भूमिका को लेकर जांच एजेंसियां सवाल उठा रही हैं…
एडीजे विजेंद्र सिंह रावत
संतोष वर्मा के खिलाफ महिला द्वारा दर्ज कराए गए मामले में एडीजे विजेंद्र सिंह रावत की अदालत से फर्जी आदेश जारी होने के आरोप लगे हैं। वर्मा का दावा है कि अदालत के आदेश के आधार पर ही उन्हें बरी माना गया और उसी आदेश को डीपीसी में लगाया गया, जिसके चलते उन्हें आईएएस अवार्ड मिला।
वहीं, जज रावत का कहना है कि उन्होंने ऐसा कोई आदेश पारित ही नहीं किया। उनके अनुसार 6 अक्टूबर 2020 को न तो उनकी अदालत में ऐसा कोई मामला सुना गया और न ही कोई आदेश जारी हुआ। उन्होंने इस संबंध में अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई, जिसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया।
सीजेएम अमन सिंह भूरिया
यह मामला पहले सीजेएम अमन सिंह भूरिया की अदालत में था, जहां से इसे बाद में एडीजे रावत की अदालत में स्थानांतरित किया गया। आरोप हैं कि इस पूरे प्रकरण में संतोष वर्मा और जज रावत के बीच संवाद इन्हीं के माध्यम से हुआ। जांच में इस मामले से जुड़ी मोबाइल चैटिंग भी सामने आई है। इस प्रकरण के चलते न्यायिक स्तर पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
एडीजे प्रकाश कसेर
इस केस में एक और विवाद 5 दिसंबर को सामने आया, जब एडीजे विजेंद्र सिंह रावत की अग्रिम जमानत मंजूर हुई। इसके बाद 18 दिसंबर को पुलिस ने टाइपिस्ट नीतू सिंह को गिरफ्तार कर रिमांड पर लिया। रिमांड के दौरान ही 19 दिसंबर को नीतू सिंह की जमानत अर्जी लग गई, जबकि केस डायरी अदालत तक पहुंची ही नहीं थी। इसके बावजूद रिमांड अवधि में जमानत मंजूर कर ली गई। 22 दिसंबर को जज प्रकाश कसेर का तबादला कर दिया गया।
टाइपिस्ट नीतू सिंह
नीतू सिंह इस केस का चौथा अहम किरदार माना जा रहा है। जब संतोष वर्मा का मामला एडीजे रावत की अदालत में था, उस समय नीतू सिंह वहां पदस्थ थे और सीआईएस से जुड़ा कार्य देख रहे थे। पुलिस ने 18 दिसंबर को कोर्ट आदेशों से जुड़े दस्तावेजों और पूछताछ के लिए उन्हें गिरफ्तार किया। यह इस केस की पहली गिरफ्तारी थी, हालांकि उसी दिन उन्हें जमानत भी मिल गई। वर्तमान में वे फैमिली कोर्ट में पदस्थ हैं।
जिला लोक अभियोजक अकरम शेख
इस प्रकरण में जिला लोक अभियोजक अकरम शेख की भूमिका भी जांच के दायरे में है। आरोप हैं कि इस पूरे मामले में मध्यस्थता का काम उनके जरिए किया गया। इसके लिए कई बार जज से मोबाइल पर बातचीत और व्हाट्सएप चैट होने की बात सामने आई है। इस भूमिका को लेकर उनके खिलाफ भी शासकीय कार्रवाई की गई है।
2016 से शुरू हुई केस की कहानी
संतोष वर्मा से जुड़ा यह मामला 18 नवंबर 2016 को शुरू हुआ, जब एक महिला ने लसूडिया थाने, इंदौर में उनके खिलाफ आईपीसी की धाराओं 493, 494, 495, 323, 294 और 506 के तहत केस दर्ज कराया। उस समय वर्मा उज्जैन में अपर कलेक्टर के पद पर पदस्थ थे।
महिला का आरोप था कि वह 2010 से वर्मा को जानती थी और शादी के प्रस्ताव के बाद दोनों ने धार जिले के हंडिया स्थित एक मंदिर में विवाह किया। बाद में पता चला कि वर्मा पहले से विवाहित थे। महिला के अनुसार शारीरिक संबंध बनाए गए, मारपीट की गई और गर्भवती होने पर दो बार जबरन गर्भपात कराया गया।
आईएएस अवार्ड से जुड़ा विवाद
महिला से जुड़े इस आपराधिक मामले का चालान जिला अदालत में पेश हो चुका था। इसी दौरान वर्ष 2020 में संतोष वर्मा का नाम डीपीसी के लिए गया, जिससे उन्हें आईएएस अवार्ड मिलना था। इसके लिए जरूरी था कि उन्हें इस केस से राहत मिले।
बताया जाता है कि पहले एक आदेश सामने आया, जिसमें समझौते के आधार पर केस खत्म होने की बात कही गई। बाद में एक दूसरा आदेश दिखाया गया, जिसमें वर्मा को पूरी तरह बरी बताया गया। यही आदेश डीपीसी में लगाया गया और इसी के आधार पर उन्हें आईएएस अवार्ड मिला। बाद में इसी आदेश को फर्जी बताया गया।
एडीजे रावत की एफआईआर से खुला पूरा मामला
इस पूरे मामले की जड़ एडीजे विजेंद्र सिंह रावत द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर को माना जा रहा है। 27 जून 2021 को एमजी रोड थाने में दर्ज इस एफआईआर में आईपीसी की धाराएं 120बी, 420, 467, 468, 471 और 472 लगाई गईं। आरोप था कि संतोष वर्मा के केस में फर्जी कोर्ट आदेश तैयार किया गया।
रावत का कहना है कि 6 अक्टूबर 2020 को वे अवकाश पर थे, उनकी पत्नी बीमार थी और उस दिन अदालत की कार्यवाही या सीआईएस में कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। उनके अनुसार उस तारीख का आदेश पूरी तरह कूटरचित है।
एफआईआर दर्ज कराने के पीछे की वजह
एफआईआर दर्ज कराने को लेकर दो तर्क सामने आए हैं। पहला यह कि संतोष वर्मा और जज रावत के बीच कथित लेन-देन या संबंध बिगड़ने के बाद मामला सामने लाया गया। दूसरा यह कि पीड़िता को जब यह जानकारी मिली कि वर्मा को बरी दिखाकर डीपीसी हो चुकी है, तो उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत आदेश की प्रति मांगी।
जब अदालत से प्रति नहीं मिली, तो उन्होंने अन्य विभागों में पत्राचार किया और अंततः सामान्य प्रशासन विभाग से फाइल निकलवाई। मामला तूल पकड़ता देख, खुद को बचाने के लिए एडीजे रावत ने एफआईआर दर्ज कराई, जिससे यह पूरा केस सार्वजनिक रूप से सामने आ गया।