निरंकुश नौकरशाही बनाम मजबूर doctors


लेखक
डॉक्टर योगेंद्र श्रीवास्तव

प्रदेश के चिकित्सक ( doctors ) फिर से आंदोलन करने के लिए लामबंद हो चुके थे मगर शासन के आश्वासन के बाद फिलहाल हड़ताल टाल दी गई है और आन्दोलन को अगली सूचना तक स्थगित कर दिया गया है। चिकित्सक महासंघ और स्वास्थ्य सचिव तथा स्वास्थ्य आयुक्त के बीच सम्पन्न एक बैठक के बाद यह फैसला लिया गया।

doctors को नौकरशाही से उम्मीद बेमानी

अगर चिकित्सकों ( doctors ) की विभिन्न समस्याओं और मांगों के प्रति प्रदेश की आला नौकरशाही के पिछले कार्यकलाप पर नजर डालें तो आगे कोई उम्मीद करना बेमानी है। प्रदेश के अफसरान को सबसे बड़ी राहत यह है कि माननीय उच्च न्यायालय द्वारा चिकित्सकों की हड़ताल पर रोक लगाई गई है लेकिन इस राहत का दुरूपयोग करके वे अपनी मनमानी पर उतारू हैं। सातवें वेतनमान से सम्बंधित लम्बित मुद्दों पर शिवराज सरकार की कैबिनेट ने सभी मुद्दे सुलझाने का निर्णय लिया था और सार्वजनिक मंच से इसकी घोषणा भी की थी। मगर सरकार बदली तो वल्लभ भवन के आला अफसरों ने सारे मुद्दे ठंडे बस्ते में डाल दिए। इसी वजह से महासंघ पहले भी हड़ताल की कोशिश कर किस है लेकिन तब माननीय हाई कोर्ट द्वारा शासन को निर्देश दिया गया था कि उच्च स्तरीय कमेटी बनाकर शासन जल्द ही सभी मुद्दे सुलझाए। मगर राजधानी के सुविधापूर्ण और सुरक्षित दफ्तरों में बैठे आला अफसरों को इतनी फुरसत नहीं कि उच्च न्यायालय के निर्देश पर स्वयं पहल करके कोई समाधान निकालने का प्रयास करें।
खास तौर चिकित्सकों से जुड़े मामलों पर आईएएस लॉबी का नजरिया बेहद संकुचित है। उनकी सबसे बड़ी तकलीफ यह है कि चिकित्सकों को सातवें वेतनमान का पूरा लाभ दे दिया गया तो उनकी तनख्वाह आईएएस के बराबर हो जाएगी और वे मीटिंगों में मंत्रियों के सामने ऐसी टिप्पणी करने से हिचकिचाते भी नहीं हैं।ये कोई पहला मामला नहीं है जब मध्यप्रदेश के आला अफसरों ने माननीय उच्च न्यायालय के आदेश को ठंडे बस्ते में डालकर रखा हो। 2024 में उच्च न्यायालय ने शासकीय सेवकों की रिकवरी के मामलों में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि दिसम्बर 2024 तक सभी मामले निबटा दिए जाएं। लेकिन अफसरों ने कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। अभी भी रिकवरी के सम्बन्ध में कोई कॉमन ऑर्डर जारी नहीं हुआ है और कई याचिकाकर्ता अवमानना याचिका दायर करने के लिए मजबूर हैं। और तो और, पेंशन कार्यालयों द्वारा अभी भी वर्षों पुरानी रिकवरी के आदेश जारी करने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। इसके पूर्व स्वास्थ्य विभाग में वर्ष 2012 में की गई रिकवरी के मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया था।
मामला लम्बित रहने के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने रिकवरी पर रोक लगाई थी मगर उसके बाद भी कई प्रकरणों में रिकवरी किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश शासन को लताड़ भी लगाई थी। आखिरकार जब प्रकरण में अंतिम निर्णय हुआ तो माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेश दिनांक 26-08-2022 द्वारा सभी चिकित्सकों से वसूली गई राशि वापस करने के निर्देश जारी किए गए। जून और दिसम्बर में रिटायर होने वाले कर्मचारियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट काफी पहले निर्णय दे चुका है कि यदि वे वेतनवृद्धि के पात्र हैं तो ऐसे कर्मचारियों को एक काल्पनिक वेतनवृद्धि जोडक़र पेंशन का निर्धारण किया जाए। इसी आधार पर राज्य के रिटायर्ड कर्मचारियों ने भी याचिकाएं दायर कीं तो माननीय उच्च न्यायालय द्वारा भी उक्त लाभ देने के निर्देश दिए गए। इसके बाद भी एक कॉमन ऑर्डर निकालने के बजाय मध्यप्रदेश शासन ने दिनांक 15-03-2024 को आदेश जारी किया कि केवल न्यायालय से निर्णीत मामलों में ही अतिरिक्त काल्पनिक वेतनवृद्धि का लाभ दिया जाए। नतीजा यह कि अनेक पात्र कर्मचारी धड़ाधड़ केस दायर कर रहे हैं और माननीय हाई कोर्ट के आदेश के बाद उन्हें उक्त लाभ दिया जा रहा है। अभी हाल में ही एक और ऐसा ही आदेश जारी हुआ जिसमें मध्यप्रदेश शासन ने कोर्ट आदेश से बचने के लिए सिर्फ एक स्पष्टीकरण जारी कर दिया। दरअसल यह प्रावधान वर्ष 2009 से ही मौजूद था कि 80 से 85 वर्ष में पेंशनर को 20त्न , 85 से 90 वर्ष में 30त्न, 90 से 95 वर्ष में 40त्न, 95 से 100 वर्ष में 50त्न तथा 100 वर्ष में 100त्न अतिरिक्त पेंशन दी जाए। प्रावधान की व्याख्या करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने कुछ प्रकरणों में निर्णय दिया था कि 79 वर्ष पूर्ण होने पर 80वें वर्ष में प्रवेश के माह से ही पेंशन वृद्धि लागू की जाए और इसी तरह 85, 90, 95 तथा 100 वर्ष में प्राप्त होने वाली पेंशन वृद्धि लागू हो। पालन न होने पर बहुत से याचिकाकर्ताओं ने कंटेंप्ट पिटीशन भी फाइल की हुई है। उसी से बचने हेतु दिनांक 21-02-2025 एक स्पष्टीकरण जारी किया गया है जिसके पैरा 2 में पुन: स्पष्ट किया जाता है शब्दों के माध्यम से शासन ने पुराने प्रावधान की पुष्टि की है।
वल्लभ भवन में बैठे बुद्धिमान अफसरों की निगाह में न्यायालय के समक्ष ठोस एवं विश्वसनीय तर्क पेश करना जरूरी नहीं बल्कि उसके बजाय पुराने आदेश का पुष्टिकरण ही पर्याप्त है जबकि माननीय हाई कोर्ट द्वारा उक्त आदेश की अलग ही व्याख्या की जा चुकी है। एक तरफ माननीय सुप्रीम कोर्ट तथा हाई कोर्ट बार- बार लम्बित मामलों की संख्या पर चिन्ता जाहिर करते हैं और सभी सरकारों को अनावश्यक मुकदमेबाजी से परहेज करने की सलाह देते हैं। मगर इसके ठीक विपरीत मध्यप्रदेश की नौकरशाही मनमाने आदेश जारी करके गैरजरूरी मुकदमेबाजी को बढ़ावा दे रही है। बहुत से मामलों में तो अफसर खुद शासकीय नियमों के विपरीत आदेश जारी करते हैं जिसके परिणामस्वरूप कर्मचारी को मजबूरन कोर्ट की शरण में जाना पड़ता है।
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट में ही शासकीय सेवा से संबंधित हजारों मामले पेंडिंग हैं और अवमानना प्रकरणों की निरन्तर बढ़ती संख्या प्रदेश के अफसरों की मनमानी और हठधर्मिता की कहानी बयान कर रही है। नौकरशाहों का ऐसा रवैया तकनीकी रूप से न सही नैतिक रूप से न्यायालय की अवमानना के समान है। मेडिकल शिक्षा निर्विवाद रूप से सबसे ज्यादा लंबी और श्रमसाध्य पेशेवर शिक्षा है जिसमें देश की सबसे मुश्किल प्रतिस्पर्धी परीक्षा नीट से गुजरने के बाद विशेषज्ञ चिकित्सक बनने के लिए कम से कम 9-10 साल जीतोड़ मेहनत करना पड़ती है। उसके बाद यदि कोई चिकित्सक सरकारी नौकरी करना चाहे तो उसे रोजमर्रा की मुश्किलों के साथ देश के किसी भी प्रान्त से कमतर वेतन पर काम करना पड़ता है। कमीशनखोरी के कारण सप्लाई होने वाली घटिया दवाओं, अधूरे इंफ्रास्ट्रक्चर, राजनितिक धौंस, प्रशासनिक हस्तक्षेप और मरीजों की मार- पीट वगैरह की चुनौतियों से जूझते हुए ढेरों समझौते करना पड़ते हैं मगर जब उसके एवज में चिकित्सक को वेतन भी आधा – अधूरा मिले तो उसका आंदोलित होना स्वाभाविक है।
सातवें वेतनमान की विसंगतियों और अन्य कई लाभों से वंचित होने के कारण प्रत्येक सरकारी चिकित्सक 20-30 हजार रु प्रतिमाह वेतन का नुकसान झेल रहा है इसीलिए अन्य मांगों के साथ इन विसंगतियों के खिलाफ चिकित्सक महासंघ ने आन्दोलन का आव्हान किया था। अगर प्रदेश सरकार के निर्वाचित प्रतिनिधियों ने वल्लभ भवन में तैनात आला अफसरों की निरंकुशता पर लगाम नहीं लगाई तो चिकित्सकों सहित लाखों शासकीय सेवकों का रोष और असंतोष सारे सिस्टम को अस्तव्यस्त कर देगा। फिलहाल गेंद फिर से एक बार उच्च पदस्थ अफसरों के पाले में है। मुकाबला नौकरशाही की मनमानी और डॉक्टर्स की मजबूरी के बीच है ।
और चिकित्सक आर-पार की लड़ाई के लिए लामबंद हो चुके हैं। उम्मीद है कि दोनों पक्ष सद्बुद्धि और सामंजस्य से काम लेंगे।