कैट्स ऑय, जिसे हिंदी में लहसुनिया कहा जाता है, वैदिक ज्योतिष में केतु ग्रह से जुड़ा एक अत्यंत प्रभावशाली रत्न माना जाता है। केतु को वैराग्य, आध्यात्मिक चेतना, तीव्र इन्टूशन, पूर्व जन्मों के कर्म, अचानक होने वाली घटनाओं और रहस्यमय अनुभवों का कारक ग्रह माना जाता है। लहसुनिया को साधारण सौभाग्य या भौतिक उन्नति के लिए नहीं, बल्कि गहरे कर्मिक और आध्यात्मिक संतुलन के लिए पहना जाता है। यही कारण है कि इसे गोमेद और नीलम की तरह पूरी जांच-पड़ताल और ट्रायल के बाद ही धारण करने की सलाह दी जाती है।
केतु ग्रह का स्वभाव और लहसुनिया का प्रभाव
केतु मोक्ष, एकांत, रहस्य, सर्जरी, दुर्घटनाएं, गूढ़ विद्या और भौतिक जीवन से दूरी का प्रतीक माना जाता है। जब केतु कमजोर या पीड़ित होते हैं, तो व्यक्ति भ्रम, भय, दिशा की कमी, अचानक नुकसान, दुर्घटनाएं या बिना स्पष्ट कारण की स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ सकता है। वहीं केतु अनुकूल स्थिति में हों, तो व्यक्ति को तीव्र इन्टूशन, आध्यात्मिक समझ और अनदेखे खतरों से सुरक्षा प्राप्त होती है। लहसुनिया ऐसे ही समय में केतु की ऊर्जा को संतुलित करने में सहायक माना जाता है।
लहसुनिया रत्न की पहचान और विशेषताएं
लहसुनिया क्राइसोबेरिल परिवार का रत्न है। इसकी सबसे खास पहचान इसकी सतह पर दिखाई देने वाली चमकदार, चलती हुई सी रेखा होती है, जो बिल्कुल बिल्ली की आंख जैसी प्रतीत होती है। इसका रंग शहद जैसा पीला, हरा-पीला या हल्का भूरा हो सकता है। श्रेष्ठ गुणवत्ता का लहसुनिया वही माना जाता है, जिसमें रेखा साफ, बीच में, लगातार और तेज चमक के साथ दिखाई दे। पत्थर में दरार, धुंधलापन या कमजोर चमक हो, तो उसका ज्योतिषीय प्रभाव कम हो सकता है।
ज्योतिषीय और कर्मिक दृष्टि से लहसुनिया
वैदिक ज्योतिष में लहसुनिया का उद्देश्य सुख-सुविधाएं बढ़ाना नहीं, बल्कि सुरक्षा, जागरूकता और कर्मिक मुक्ति प्रदान करना माना जाता है। यह जीवन में छिपे हुए डर, भ्रम और बाधाओं को अचानक हटाने में सहायक हो सकता है। अक्सर इसे केतु की महादशा या अंतरदशा में पहनने की सलाह दी जाती है, खासकर तब जब व्यक्ति को बिना कारण नुकसान, बार-बार असफलता, अकेलापन, दुर्घटनाएं या समझ से परे स्वास्थ्य समस्याएं परेशान कर रही हों। यदि कुंडली में केतु शुभ हों लेकिन अटके हुए हों, तो लहसुनिया इन्टूशन को मजबूत करता है और बार-बार दोहराए जा रहे कर्मिक चक्रों से बाहर निकलने में मदद कर सकता है।
लहसुनिया रत्न पहनने के संभावित लाभ
लहसुनिया को लेकर माना जाता है कि यह अचानक होने वाले नुकसान, दुर्घटनाओं और दुर्भाग्य से रक्षा कर सकता है। यह इन्टूशन, मानसिक स्पष्टता और आध्यात्मिक जागरूकता बढ़ाने में सहायक हो सकता है। साथ ही डर, भ्रम और नकारात्मक कर्म प्रभाव को कम करने में भी इसका योगदान बताया जाता है। ध्यान, ज्योतिष, तंत्र, शोध और गूढ़ विद्या से जुड़े क्षेत्रों में कार्य करने वालों के लिए इसे उपयोगी माना जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार यह रहस्यमय या बिना स्पष्ट कारण की बीमारियों में भी राहत दे सकता है।
लहसुनिया पहनने की विधि
लहसुनिया रत्न आमतौर पर चांदी या पंचधातु में जड़वाकर पहना जाता है। इसे दाहिने हाथ की मध्य उंगली या अनामिका में धारण करने की परंपरा है। मंगलवार या गुरुवार की शाम, केतु काल में इसे पहनना शुभ माना जाता है। रत्न धारण करते समय “ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः” मंत्र का 108 बार जप करने की सलाह दी जाती है, ताकि केतु की ऊर्जा से सही तालमेल बन सके।
सावधानियां और जरूरी चेतावनी
लहसुनिया एक अत्यंत संवेदनशील और कर्मिक रत्न माना जाता है, इसलिए इसे हमेशा ट्रायल के बाद ही पहनना चाहिए। आमतौर पर 57 दिनों का ट्रायल सुझाया जाता है, चाहे अंगूठी में हो या लॉकेट के रूप में। यदि पहनने के बाद डर, अलगाव, नुकसान या स्वास्थ्य संबंधी समस्या बढ़े, तो इसे तुरंत उतार देना चाहिए। टूटा हुआ, नकली या कमजोर रेखा वाला लहसुनिया नहीं पहनना चाहिए और बिना विशेषज्ञ सलाह के इसे माणिक, मोती, पुखराज, नीलम या गोमेद के साथ भी नहीं धारण करना चाहिए।