भोपाल में आवारा कुत्तों का खौफ बरकरार, 2 करोड़ खर्च के बावजूद रोज 160 डॉग बाइट के मामले

भोपाल में आवारा कुत्तों की बढ़ती मौजूदगी अब सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा बन चुकी है। शहर में कुत्तों की नसबंदी और नियंत्रण के लिए करीब 2 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद डॉग बाइट के मामलों में अपेक्षित कमी नहीं दिखी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक रोजाना औसतन 160 लोग कुत्तों के काटने के बाद इलाज के लिए अस्पताल पहुंच रहे हैं।

नगर निगम स्तर पर पिछले वर्षों में आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने के लिए अभियान चलाए गए। इनमें पकड़ने, नसबंदी और बाद में क्षेत्र में छोड़ने जैसी प्रक्रिया शामिल रही। लेकिन जमीन पर असर सीमित रहने से कई इलाकों में लोगों की शिकायतें जारी हैं। कॉलोनियों, बाजार क्षेत्रों और कचरा स्थलों के आसपास कुत्तों के झुंड की मौजूदगी को स्थानीय कारणों में माना जा रहा है।

स्वास्थ्य तंत्र पर इसका सीधा दबाव दिख रहा है। डॉग बाइट के मरीजों को एंटी-रेबीज वैक्सीन और जरूरी उपचार के लिए सरकारी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। रोजाना 160 के आसपास मरीज पहुंचना यह संकेत देता है कि जोखिम का स्तर अभी भी ऊंचा है और रोकथाम के उपाय पर्याप्त नहीं रहे हैं।

खर्च और परिणाम में अंतर

करीब 2 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी स्थिति में ठोस सुधार नहीं दिखना प्रशासनिक समीक्षा की मांग कर रहा है। शहरी निकायों में आवारा कुत्तों को लेकर आम तौर पर लक्ष्य तय किए जाते हैं, लेकिन परिणाम की निगरानी, क्षेत्रवार डेटा और नियमित फॉलोअप कमजोर होने पर अभियान का असर घट जाता है। भोपाल का मौजूदा परिदृश्य भी इसी अंतर को सामने रखता है।

विशेषज्ञों के अनुसार सिर्फ नसबंदी के आंकड़े बताने से समस्या हल नहीं होती। किस वार्ड में कितने कुत्ते हैं, कितने की नसबंदी हुई, कितनों का टीकाकरण हुआ और किन क्षेत्रों में डॉग बाइट ज्यादा हैं, इसका एकीकृत रिकॉर्ड जरूरी होता है। ऐसी निगरानी के बिना खर्च और नतीजों का वास्तविक आकलन मुश्किल रहता है।

शहर के लिए दोहरी चुनौती

डॉग बाइट की समस्या केवल हमले तक सीमित नहीं है, यह रेबीज जैसी बीमारी के जोखिम से भी जुड़ी है। इसलिए नागरिक सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य, दोनों स्तरों पर तेज और समन्वित कार्रवाई की जरूरत है। एक तरफ पशु कल्याण नियमों का पालन करना होता है, दूसरी तरफ आबादी वाले क्षेत्रों में जोखिम कम करना प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है।

कई इलाकों में स्थानीय स्तर पर शिकायत यह भी रहती है कि कुत्तों को पकड़ने वाली टीमें नियमित नहीं पहुंचतीं। वहीं, भोजन के खुले स्रोत और कचरे के ढेर कुत्तों के जमाव को बढ़ाते हैं। ऐसे में केवल एक विभाग की कार्रवाई पर्याप्त नहीं होती, बल्कि नगर निगम, स्वास्थ्य विभाग और क्षेत्रीय निगरानी तंत्र को साथ काम करना पड़ता है।

आगे क्या जरूरी

भोपाल की मौजूदा स्थिति से साफ है कि अब कागजी प्रगति से आगे बढ़कर परिणाम आधारित मॉडल अपनाने की जरूरत है। वार्डवार सर्वे, पारदर्शी ऑनलाइन डेटा, समयबद्ध नसबंदी, एंटी-रेबीज टीकाकरण और शिकायतों पर त्वरित फील्ड रिस्पॉन्स जैसे कदम प्राथमिकता में लाने होंगे।

रोजाना 160 डॉग बाइट मामलों का आंकड़ा बताता है कि समस्या अभी नियंत्रण में नहीं है। 2 करोड़ रुपये के खर्च के बाद भी यदि शहर को राहत नहीं मिल रही, तो रणनीति की नई समीक्षा और सख्त क्रियान्वयन अब टालने की स्थिति में नहीं है।