सुप्रीम कोर्ट में स्ट्रीट Dogs पर बड़ी बहस : कहा – “डरने वालों को सूंघ कर हमला करते हैं आवारा कुत्ते”

New Delhi : सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों पर विस्तृत बहस हुई। जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान कई पक्षों की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने कहा कि कुत्ते और बिल्लियां अक्सर प्रतिद्वंद्वी होते हैं, पर यह सवाल है कि क्या समाधान के रूप में किसी एक प्रजाति को बढ़ाने या घटाने का तरीका अपनाया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान जजों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि चाहे पालतू हों या आवारा, कुत्ते प्राय: व्यक्ति के डर को महसूस कर उसी आधार पर उसकी ओर आक्रामक हो सकते हैं।
बजट पर बहस और shelter होम की चुनौती
एनजीओ प्रतिनिधियों और एक्टिविस्ट वकीलों ने बताया कि मौजूदा परिस्थितियों में 91,800 नए shelter बनाने के लिए लगभग 26,800 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इतना बड़ा बजट इंसानों के घर निर्माण पर खर्च नहीं किया जाना चाहिए। कुछ वकीलों ने यह भी कहा कि जब तक कुत्तों के लिए स्थायी आवास तय नहीं होते, उन्हें पकड़ने की प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती।
वकील ध्रुव मेहता ने दलील दी कि नगर पालिकाओं के पास अलग से इस उद्देश्य के लिए बजट नहीं है, इसलिए किसी ठोस डेटा के बिना किसी आदेश पर आगे बढ़ना उचित नहीं होगा।
‘हिंसक कुत्ते’ की परिभाषा पर सवाल
बीजेपी नेता विजय गोयल के वकील ने राणा प्रताप बाग में हुए एक पुराने मामले का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि एक ही कुत्ते ने सात साल के बच्चे और दो बुजुर्गों सहित कई लोगों को काटा था। उनके अनुसार, जब एक ही कुत्ता कई बार घटनाओं में शामिल हो, तो ऐसे मामलों में सख्त परिभाषा आवश्यक है। उन्होंने कहा कि उनकी हेल्पलाइन पर लोगों की शिकायतों की संख्या 20 हजार से अधिक पहुंच चुकी है।

“कानून को इस दृष्टि से समझना होगा कि यह सुरक्षा सुनिश्चित करे और पशु क्रूरता को भी न बढ़ाए।” — विजय गोयल के वकील

PETA और IIT दिल्ली मॉडल पर चर्चा
पेटा (PETA) के वकील श्याम दीवान ने कुत्तों को बंद पिंजरे में रखना क्रूरता बताया और माइक्रो चिपिंग जैसे आधुनिक उपाय सुझाए। वहीं, अधिवक्ता करुणा नंदी ने IIT दिल्ली का उदाहरण दिया, जहां बिना किसी हटाने की कार्रवाई के केवल एबीसी प्रोग्राम और जियोटैगिंग से तीन साल में रेबीज और काटने की घटनाएं समाप्त हो गईं। उन्होंने बताया कि स्थानीय आरडब्ल्यूए के साथ मिलकर फीडिंग ज़ोन तय करने की नीति कारगर रही है।
कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि इस विषय पर संतुलित नीति बनाना जरूरी है ताकि नागरिक सुरक्षा और पशु कल्याण दोनों सुनिश्चित रहें।
मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार को होगी।