CBSE का बड़ा फैसला: हर स्कूल में छात्राओं के लिए बनेगा ‘मेंस्ट्रुअल हेल्थ सेंटर’

New Delhi: देश के सबसे बड़े शिक्षा बोर्ड, CBSE (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) ने महिला सशक्तिकरण और स्वास्थ्य की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। बोर्ड ने अपने सभी संबद्ध स्कूलों को निर्देश जारी किया है कि परिसर के भीतर अनिवार्य रूप से ‘मेंस्ट्रुअल हेल्थ सेंटर’ (मासिक धर्म स्वास्थ्य केंद्र) स्थापित किए जाएं। इस पहल का उद्देश्य छात्राओं को स्कूल में सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक वातावरण प्रदान करना है।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का असर
CBSE का यह निर्देश 20 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले के बाद आया है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता और आवश्यक सुविधाएं प्राप्त करना हर लड़की का मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने चिंता जताई थी कि सुविधाओं के अभाव में लड़कियों की पढ़ाई और उनके आत्मविश्वास पर नकारात्मक असर पड़ता है, जिसे दूर करना अनिवार्य है।
कैसा होगा ‘मेंस्ट्रुअल हेल्थ सेंटर’?
इन केंद्रों को स्कूलों में MHM (Menstrual Hygiene Management) कॉर्नर के रूप में भी विकसित किया जा सकता है। यहाँ निम्नलिखित सुविधाएँ सुनिश्चित की जाएंगी:
  • उपलब्धता: छात्राओं के लिए सैनिटरी नैपकिन की आसान और बिना किसी झिझक के उपलब्धता।
  • स्वच्छता: उपयोग किए गए नैपकिन के सुरक्षित और वैज्ञानिक निपटान (Disposal) के लिए इंसिनरेटर या अन्य व्यवस्था।
  • जागरूकता: स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरी जानकारी और परामर्श की सुविधा।
जागरूकता और रिपोर्टिंग पर सख्ती
CBSE ने साफ किया है कि केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना काफी नहीं है। स्कूलों को प्यूबर्टी एजुकेशन और जेंडर सेंसिटिविटी पर विशेष सत्र आयोजित करने होंगे ताकि इस विषय से जुड़ी सामाजिक झिझक को खत्म किया जा सके।
बोर्ड ने इस प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए एक सख्त रिपोर्टिंग सिस्टम भी लागू किया है:
  1. सभी स्कूलों को एक आधिकारिक गूगल फॉर्म के जरिए अपनी तैयारी की जानकारी देनी होगी।
  2. पहली रिपोर्ट जमा करने की अंतिम तिथि 31 मार्च 2026 तय की गई है।
  3. दूसरी प्रगति रिपोर्ट 30 अप्रैल 2026 तक अनिवार्य रूप से जमा करनी होगी।
एक नई सोच की शुरुआत
इस पहल का दूरगामी लक्ष्य स्कूलों में एक ऐसा समावेशी माहौल तैयार करना है, जहाँ लड़कियां अपनी शारीरिक जरूरतों को लेकर शर्म महसूस न करें। यह कदम न केवल ड्रॉप-आउट दर को कम करने में मदद करेगा, बल्कि किशोरियों के स्वास्थ्य के प्रति समाज के नजरिए को भी बदलेगा।