दतिया : पीतांबरा पीठ पर सरकारी ‘निगरानी’: आस्था का सम्मान या ट्रस्ट की स्वायत्तता पर प्रहार?

Datia News :  देश के सबसे प्रतिष्ठित और शक्तिशाली शक्तिपीठों में शुमार दतिया की श्री पीतांबरा पीठ इस समय धार्मिक और राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है। राज्य सरकार और जिला प्रशासन द्वारा मंदिर की व्यवस्थाओं और निर्माण कार्यों की निगरानी के लिए एक 5 सदस्यीय समिति गठित करने के फैसले ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।
जहाँ प्रशासन इसे ‘सुरक्षा और पारदर्शिता’ का नाम दे रहा है, वहीं ट्रस्ट इसे मंदिर की स्वायत्तता और परंपराओं में हस्तक्षेप मान रहा है।
पिलर गिरने की घटना बनी आधार
प्रशासनिक सक्रियता की तात्कालिक वजह मंदिर परिसर में चल रहे निर्माण कार्य के दौरान 8 पिलर का गिरना बताया जा रहा है। हालाकि इस घटना में कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन इसने निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

इसके अतिरिक्त, प्रशासन को लगातार ऐसी शिकायतें मिल रही थीं कि कुछ रसूखदार लोग नियमों को ताक पर रखकर अपने करीबियों को ‘वीआईपी दर्शन’ करवा रहे हैं, जिससे घंटों लाइन में खड़े आम श्रद्धालुओं को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
इन्हीं अनियमितताओं को आधार बनाकर कलेक्टर स्वप्निल वानखेड़े ने संयुक्त कलेक्टर के नेतृत्व में एक कमेटी तैनात कर दी है।
वसुंधरा राजे बनाम प्रशासन: क्या है राजनीतिक मायना?
पीतांबरा पीठ ट्रस्ट की अध्यक्षता राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की वरिष्ठ नेता वसुंधरा राजे करती हैं। राजनीतिक गलियारों में यह सुगबुगाहट तेज है कि यह कदम केवल व्यवस्था सुधार तक सीमित नहीं है। जानकारों का मानना है कि यह समिति गठित करना असल में ट्रस्ट पर राजे के प्रभाव को कम करने और शासन का नियंत्रण बढ़ाने की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है।
‘साधना स्थली’ की गोपनीयता पर संकट
मंदिर प्रबंधन ने इस कदम का कड़ा विरोध किया है। प्रबंधक महेश दुबे के अनुसार, पीतांबरा पीठ कोई साधारण सार्वजनिक मंदिर नहीं, बल्कि एक सिद्ध साधना स्थली है। यहाँ के अनुष्ठान और जप-तप की परंपराएं अत्यंत गोपनीय और कठोर होती हैं। सरकारी हस्तक्षेप से इन प्राचीन परंपराओं और साधकों की गोपनीयता भंग होने का डर है।
कानूनी लड़ाई की आहट
कलेक्टर वानखेड़े का तर्क है कि कमेटी का उद्देश्य हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि निर्माण की गुणवत्ता और दर्शन व्यवस्था को दुरुस्त करना है। उन्होंने मंदिर के सदस्यों को भी कमेटी में शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। लेकिन, ट्रस्ट के कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी स्वायत्त ट्रस्ट में इस तरह प्रशासनिक समिति थोपना नियमों के विरुद्ध है।
मंदिर प्रबंधन ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि यह फैसला वापस नहीं लिया गया, तो वे हाई कोर्ट का रुख करेंगे।
पौराणिक मान्यता है कि पीतांबरा पीठ को ‘राजसत्ता की देवी’ माना जाता है, जहाँ राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक नतमस्तक होते हैं। ऐसे में आस्था के इस बड़े केंद्र पर सरकारी ‘पहरे’ ने कई सवाल छोड़ दिए हैं। क्या यह वास्तव में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए है, या फिर अध्यात्म के गलियारे में वर्चस्व की कोई नई इबारत लिखी जा रही है?