इंदौर के नजदीक धरमपुरी सोलसिंदा में चल रही एक दवा फैक्ट्री के मामले में बेहद गंभीर खुलासा हुआ है। रेविहांस हर्बल प्राइवेट लिमिटेड नामक फैक्ट्री से जब्त किए गए आयुर्वेदिक कफ सिरप के सैंपल जांच में ‘नॉन-स्टैंडर्ड’ (मानक विहीन) पाए गए हैं। सूत्रो के अनुसार बताया जा रहा है कि यह खुलासा ग्वालियर की सरकारी प्रयोगशाला (लैब) की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट आने के बाद पुलिस ने 20 जनवरी को फैक्ट्री संचालक सुरेंद्र सिंह के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। यह मामला सीधे तौर पर जन स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है, क्योंकि ये दवाएं बिना तय मानकों के बनाई जा रही थीं।
प्रशासन ने पिछले दिनों इस फैक्ट्री पर छापा मारकर वहां बन रहे सिरप के आठ सैंपल जांच के लिए भेजे थे। लैब रिपोर्ट में ये सभी आठों सैंपल फेल हो गए हैं। जांच में सामने आया है कि सिरप बनाने में इस्तेमाल होने वाला बेस और अन्य घटक सही अनुपात और गुणवत्ता के नहीं थे।
ग्वालियर लैब की रिपोर्ट में दो बड़ी खामियां
ग्वालियर स्थित सरकारी लैब ने अपनी ‘सर्टिफिकेट ऑफ एनालिसिस’ रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि जब्त किए गए सिरप के नमूने दो प्रमुख पैमानों पर खरे नहीं उतरे। पहला, इनमें ‘अल्कोहल सॉल्युबल एक्सट्रैक्ट्स’ (Alcohol Soluble Extracts) की मात्रा मानकों के अनुसार नहीं थी। दूसरा, यह ‘थिन लेयर क्रोमैटोग्राफी’ (Thin Layer Chromatography) टेस्ट में भी फेल हो गए।
तकनीकी रूप से इसका अर्थ यह है कि सिरप तैयार करने के लिए अल्कोहल के बेस में जो औषधीय तत्व घुलने चाहिए थे, वे या तो निम्न गुणवत्ता के थे या उनका मिश्रण सही तरीके से नहीं किया गया था। ड्रग इंस्पेक्टर (आयुष) द्वारा जारी सर्टिफिकेट में भी इन खामियों की पुष्टि की गई है।
एफआईआर में उल्लेख किया गया है कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 के नियमों का उल्लंघन कर ये दवाएं बनाई जा रही थीं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हो सकती हैं।
मैथ्स ग्रेजुएट बना था केमिस्ट
इस मामले में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है जो दवा निर्माण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है। फैक्ट्री में कफ सिरप बनाने की जिम्मेदारी जिस केमिस्ट पर थी, उसके पास फार्मेसी की कोई डिग्री ही नहीं थी।
जांच टीम ने जब केमिस्ट संजय डेविड से उसकी योग्यता के दस्तावेज मांगे, तो पता चला कि वह बीएससी (गणित) पास है। दवाओं के निर्माण जैसे संवेदनशील काम में एक अयोग्य व्यक्ति की नियुक्ति यह दर्शाती है कि फैक्ट्री में नियमों की किस हद तक अनदेखी की जा रही थी।
दिसंबर में हुई थी प्रशासनिक कार्रवाई
गौरतलब है कि 18 दिसंबर को सांवेर एसडीएम घनश्याम धनगर के नेतृत्व में जिला प्रशासन और आयुष विभाग की संयुक्त टीम ने रेविहांस हर्बल फैक्ट्री का निरीक्षण किया था। मौके पर टीम को भारी अनियमितताएं मिली थीं। वहां 8 से ज्यादा तरह के आयुर्वेदिक सिरप बनाए जा रहे थे, लेकिन फैक्ट्री में न तो कोई टेस्टिंग लैब थी और न ही प्रोडक्ट फाइलिंग के दस्तावेज मौजूद थे।
फैक्ट्री में सुरक्षा मानकों का भी पालन नहीं हो रहा था। फायर सेफ्टी, स्वच्छता और स्वास्थ्य सुरक्षा के इंतजाम नदारद थे। इन गंभीर खामियों को देखते हुए प्रशासन ने फैक्ट्री को सील कर दिया था।
बड़ी कंपनियों से टाइअप का दावा निकला झूठा
फैक्ट्री में मिले उत्पादों पर ‘मनोमय लाइव केयर प्राइवेट लिमिटेड’ (जीरकपुर, पंजाब) और ‘रेभियांश बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड’ (देहरादून) जैसी कंपनियों के नाम लिखे हुए थे। जब अधिकारियों ने संचालक सुरेंद्र सिंह से इन कंपनियों के साथ टाइअप (अनुबंध) के दस्तावेज मांगे, तो वे कोई भी कागज पेश नहीं कर सके।
जांच में यह स्पष्ट हो गया कि ब्रांडेड कंपनियों के नाम का इस्तेमाल कर अवैध रूप से दवाएं बनाई और बेची जा रही थीं। अब लैब रिपोर्ट आने के बाद पुलिस ने कानूनी शिकंजा और कस दिया है।