नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के इंदौर में दूषित पानी पीने से 20 से अधिक लोगों की मौत पर पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने इसे शहरी नियोजन की विफलता का घातक परिणाम बताते हुए व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सिंह ने कहा कि अगर नागरिकों के नल से स्वच्छ जल नहीं निकलता, तो विकास अधूरा है।
एक बयान में दिग्विजय सिंह ने कहा कि इस मानवीय त्रासदी की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि लापरवाही और भ्रष्टाचार का सीवेज जिम्मेदारी और नैतिकता की स्वच्छ जल व्यवस्था में कैसे मिल गया। उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार का पहला दायित्व नागरिकों को सुरक्षित और स्वस्थ जीवन देना होता है।
शहरी नियोजन पर भूले सबक
दिग्विजय सिंह ने शहरी विकास पर दूरदृष्टि की कमी को लेकर चिंता जताई। उन्होंने याद दिलाया कि 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने वास्तुकार चार्ल्स कोरिया की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शहरीकरण आयोग बनाया था, जिसकी सिफारिशों पर 74वां संविधान संशोधन हुआ। उन्होंने सवाल किया, “क्या आज भी शहरी नियोजन में वैसी दूरदृष्टि शेष है, या हम केवल स्मार्ट सिटी के चमकते पोस्टरों में उलझकर रह गए हैं?”
उन्होंने भोपाल का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में 1994 में लागू हुए मास्टर प्लान को 2004-05 में अपडेट किया जाना चाहिए था, लेकिन पिछले बीस वर्षों में इस पर गंभीरता से काम नहीं हुआ।
जल जीवन मिशन और भ्रष्टाचार के आरोप
सिंह ने प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किए गए राष्ट्रीय जल जीवन मिशन के क्रियान्वयन पर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के विधायकों ने भी इस योजना में लापरवाही और भ्रष्टाचार की शिकायतें की हैं। उन्होंने विशेष रूप से गुजरात की कुछ कंपनियों को दिए गए ठेकों पर सवाल उठाए।
उन्होंने के.एस. गोधानी कंस्ट्रक्शन (सूरत), इनफाइनाइट कंस्ट्रक्शन (सूरत), अमृत इन्फ्राप्रोजेक्ट (सूरत) और नीलकंठ कॉर्पोरेशन (अहमदाबाद) जैसी कई कंपनियों का नाम लेते हुए पूछा कि इन्हें किन शर्तों पर ठेके दिए गए। सिंह ने आरोप लगाया कि कई कंपनियों ने काम पूरा किए बिना भुगतान ले लिया और बाद में ब्लैकलिस्ट होने के बावजूद दूसरे नामों से फिर ठेके हासिल कर लिए।
“शहरी नियोजन की विफलता का घातक परिणाम है इंदौर की त्रासदी, नल से स्वच्छ जल नहीं निकलता, तो विकास अधूरा।” — दिग्विजय सिंह
उन्होंने आशंका जताई कि इंदौर के भागीरथपुरा में पेयजल लाइनों में भ्रष्टाचार का यही सीवेज मिल गया होगा। सिंह ने बताया कि आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में योजना की स्थिति और भी खराब है, जहाँ कई जगहों पर नल-जल योजना सिर्फ कागजों में पूरी हो गई है।
जल संकट और अधूरा विकास
इंटरनेशनल सेंटर फॉर सस्टेनिबिलिटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए सिंह ने कहा कि भारत का लगभग 70% पानी दूषित है। उन्होंने 2003 में मध्य प्रदेश के चार बड़े शहरों के लिए मिले 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर के ऋण का मुद्दा भी उठाया और पूछा कि उस विशाल धनराशि का लाभ आम नागरिकों तक क्यों नहीं पहुंचा।
सिंह ने कहा कि अगर देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में यह हाल है, तो दूर-दराज के इलाकों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। उन्होंने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि अब ठेकेदार-केंद्रित सोच को छोड़कर नागरिक-केंद्रित व्यवस्था बनाने की जरूरत है, वरना ऐसी त्रासदियां बार-बार चेतावनी देती रहेंगी।