भागीरथी नदी में छिपा दिव्य शिवलिंग, सर्दियों में ही क्यों मिलते हैं दर्शन?

उत्तराखंड का प्रसिद्ध गंगोत्री धाम इन दिनों लगातार चर्चा में बना हुआ है। हाल ही में गंगोत्री मंदिर समिति द्वारा धाम परिसर में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर लिए गए फैसले ने नई बहस को जन्म दिया है। हालांकि, इन तमाम विवादों से अलग गंगोत्री धाम अपनी प्राचीन पौराणिक आस्थाओं और एक रहस्यमयी शिवलिंग के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। यह वही दिव्य शिवलिंग है, जिसके दर्शन भक्तों को पूरे साल नहीं बल्कि केवल कुछ खास समय में ही संभव हो पाते हैं।

भागीरथी नदी में स्थित जलमग्न शिवलिंग

गंगोत्री मंदिर के समीप भागीरथी नदी की धारा के बीच एक प्राकृतिक पत्थर से बना शिवलिंग स्थित है, जिसे जलमग्न शिवलिंग कहा जाता है। वर्ष के अधिकांश समय ग्लेशियरों के पिघलने से भागीरथी नदी का जलस्तर ऊंचा रहता है, जिससे यह शिवलिंग पूरी तरह जल में डूबा रहता है।

सर्दियों के मौसम में जब पहाड़ों पर भारी बर्फबारी होती है और नदी का पानी जमने लगता है, तब जलस्तर काफी नीचे चला जाता है। इसी दौरान यह दिव्य शिवलिंग स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है और भक्तों को इसके दुर्लभ दर्शन का अवसर मिलता है। मान्यता है कि गंगा के स्वर्ग से धरती पर अवतरण के समय उनके तीव्र वेग को संभालने के लिए भगवान शिव इसी स्थान पर विराजमान हुए थे।

राजा भगीरथ की कठोर तपस्या की कथा

गंगोत्री धाम का संबंध राजा भगीरथ की तपस्या से भी जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए इसी स्थान पर हजारों वर्षों तक कठिन तप किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ही मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं और मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त हुआ।

शिव की जटाओं में समाई गंगा

कथाओं में वर्णन मिलता है कि गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर सकती थी। तब भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया और उनके वेग को नियंत्रित किया। माना जाता है कि गंगोत्री वही पवित्र स्थान है, जहां से गंगा की धारा ने पहली बार धरती को स्पर्श किया।

पशुपतिनाथ मंदिर से जुड़ा गंगोत्री का संबंध

गंगोत्री धाम का संबंध नेपाल स्थित प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर से भी जोड़ा जाता है। एक विशेष परंपरा के अनुसार, गंगोत्री से लाए गए पवित्र गंगाजल से ही पशुपतिनाथ मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाता है। यह परंपरा गंगोत्री धाम की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ा देती है।

शीतकालीन प्रवास और कपाट खुलने की परंपरा

समुद्र तल से लगभग 3,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गंगोत्री धाम में मौसम की कठोरता के कारण साल भर पूजा-अर्चना संभव नहीं हो पाती। हर वर्ष अक्षय तृतीया के दिन मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं, जबकि दिवाली या भाई दूज के आसपास इन्हें बंद कर दिया जाता है। शीतकाल के दौरान जब मंदिर बंद रहता है, तब मां गंगा की प्रतिमा को नीचे स्थित मुखवा गांव में स्थापित किया जाता है। अगले छह महीनों तक वहीं विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है, जिसके बाद गर्मियों में प्रतिमा को पुनः गंगोत्री धाम लाया जाता है।