फर्जी मूल निवासी प्रमाण पत्र के आधार पर मेडिकल की पढ़ाई में प्रवेश लेने के मामले में एसटीएफ कोर्ट भोपाल ने भिंड जिले में पदस्थ एक चिकित्सक को दोषी ठहराया है। न्यायालय ने आरोपी को गंभीर अपराध का दोषी मानते हुए तीन वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों से प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता पर सीधा असर पड़ता है और वास्तविक व योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों का हनन होता है।
लंबे समय तक शासकीय सेवा में रहा आरोपी
अदालत ने अपने फैसले में इस तथ्य को भी गंभीर माना कि आरोपी लंबे समय तक शासकीय अस्पताल में चिकित्सक के पद पर पदस्थ रहा। न्यायालय के अनुसार, शासकीय सेवा में रहते हुए इस प्रकार का कृत्य न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि सार्वजनिक विश्वास को भी ठेस पहुंचाता है।
व्यापमं की पीएमटी परीक्षा से जुड़ा है प्रकरण
यह मामला व्यापमं द्वारा आयोजित एमबीबीएस प्रवेश परीक्षा से संबंधित है। जांच के दौरान सामने आया कि आरोपी डॉक्टर सीताराम शर्मा मूल रूप से उत्तरप्रदेश का निवासी था, लेकिन उसने स्वयं को मध्यप्रदेश का निवासी दिखाने के लिए कूटरचित मूल निवासी प्रमाण पत्र तैयार कराया।
राज्य कोटे की मेडिकल सीट पर लिया गलत लाभ
इसी फर्जी दस्तावेज के आधार पर आरोपी ने मध्यप्रदेश राज्य कोटे की मेडिकल सीट पर प्रवेश प्राप्त किया। जांच में यह स्पष्ट हुआ कि यदि यह फर्जीवाड़ा नहीं किया गया होता, तो वह सीट किसी योग्य और वास्तविक मध्यप्रदेश निवासी अभ्यर्थी को मिल सकती थी।
2009 में पीएमटी पास कर लिया मेडिकल कॉलेज में दाखिला
वर्ष 2009 में व्यापमं द्वारा आयोजित प्री-मेडिकल टेस्ट (PMT) में सफलता प्राप्त करने के बाद आरोपी ने फर्जी मूल निवासी प्रमाण पत्र का उपयोग कर मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह शासकीय स्वास्थ्य सेवा में चयनित हुआ और चिकित्सक के रूप में सेवाएं देने लगा।
2019 में दर्ज हुआ आपराधिक प्रकरण
मामले की शिकायत प्राप्त होने के बाद वर्ष 2019 में भोपाल के थाना हबीबगंज में प्रकरण दर्ज किया गया। इसके बाद पुलिस द्वारा मामले की गहन जांच शुरू की गई। विवेचना के दौरान यह तथ्य सामने आया कि आरोपी ने वर्ष 1984 में उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद से हाईस्कूल और वर्ष 2001 में इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की थी, जिससे उसका उत्तरप्रदेश का स्थायी निवासी होना प्रमाणित हुआ।
कूटरचित दस्तावेजों से बनाई गई झूठी पहचान
जांच में यह भी उजागर हुआ कि इन तथ्यों के बावजूद आरोपी ने फर्जी दस्तावेज तैयार कर स्वयं को मध्यप्रदेश का मूल निवासी बताया और उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया। जांच पूरी होने के बाद फर्जी मूल निवासी प्रमाण पत्र को निरस्त कर दिया गया और आरोपी के खिलाफ चालान न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।
अदालत ने सभी आरोप किए सिद्ध
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने दस्तावेजी साक्ष्य, गवाहों के बयान और अन्य प्रमाणों के माध्यम से आरोपों को सिद्ध किया। एसटीएफ कोर्ट भोपाल के एडीपीओ आकिल खान के अनुसार, 23वें अपर सत्र न्यायाधीश अतुल सक्सेना ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं में दोषसिद्ध पाया।
आरोपी को दी गई सजा
न्यायालय ने आरोपी को
- धारा 420 के तहत तीन वर्ष का सश्रम कारावास और 500 रुपये जुर्माना,
- धारा 467 के तहत तीन वर्ष का सश्रम कारावास और 500 रुपये जुर्माना,
- धारा 468 के तहत तीन वर्ष का सश्रम कारावास और 500 रुपये जुर्माना,
- धारा 471 के तहत दो वर्ष का सश्रम कारावास और 500 रुपये जुर्माना
की सजा सुनाई है।
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी द्वारा किया गया कृत्य अत्यंत गंभीर है, क्योंकि इससे योग्य अभ्यर्थियों के अधिकार छीने गए हैं। शासकीय स्वास्थ्य सेवा में कार्यरत चिकित्सक द्वारा इस तरह का अपराध किया जाना और भी अधिक चिंताजनक है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने कठोर दंड दिया है।