मध्य प्रदेश की बिजली वितरण व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रदेश की तीनों प्रमुख बिजली वितरण कंपनियां—पूर्व, मध्य और पश्चिम क्षेत्र—वित्तीय संकट से जूझ रही हैं। बिजली चोरी पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है, तकनीकी खामियों के कारण लाइन लॉस लगातार बढ़ रहा है और बड़े बकायादारों से करोड़ों रुपये की वसूली भी पूरी तरह नहीं हो पा रही है। इन सभी कमजोरियों का असर अंततः आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है, क्योंकि हर बार कंपनियां अपने घाटे की भरपाई के लिए बिजली दरों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव देती रही हैं। इस बार भी स्थिति कुछ ऐसी ही बनती नजर आ रही है और प्रदेश के करीब पौने दो करोड़ बिजली उपभोक्ताओं पर इसका असर पड़ सकता है।
दरअसल, तीनों बिजली वितरण कंपनियों ने हाल ही में विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में पिछले नौ वर्षों का विस्तृत आय-व्यय विवरण प्रस्तुत किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी को लगभग 16,188.48 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, जबकि पश्चिम क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी को 3,767 करोड़ रुपये का घाटा झेलना पड़ा। वहीं मध्य क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी को करीब 14,605.88 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। इस तरह देखा जाए तो पिछले नौ वर्षों में इन तीनों कंपनियों का कुल घाटा 34,561 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो बिजली वितरण व्यवस्था की आर्थिक स्थिति पर गंभीर चिंता पैदा करता है।
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि घाटा कम करने के लिए बड़े स्तर पर खर्च करने के बावजूद पूर्व और मध्य क्षेत्र की कंपनियां लगातार नुकसान में चल रही हैं। आंकड़ों के अनुसार, पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी का सबसे अधिक घाटा वर्ष 2018-19 में दर्ज किया गया था, जब यह करीब 2,896 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। इसके बाद वर्ष 2022-23 में भी कंपनी को 2,451 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। हालांकि 2024-25 के वित्तीय वर्ष में घाटा कुछ कम होकर 1,047 करोड़ रुपये पर आ गया है, लेकिन कंपनी अभी भी लाभ में नहीं आ सकी है। इसी तरह मध्य क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। इस कंपनी का सबसे बड़ा घाटा वर्ष 2018-19 में 3,837 करोड़ रुपये रहा था, जबकि 2024-25 में भी लगभग 1,570 करोड़ रुपये का नुकसान दर्ज किया गया है।
इन वित्तीय आंकड़ों के आधार पर बिजली कंपनियों ने मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग के सामने बिजली दरों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव भी रखा है। कंपनियों का तर्क है कि लगातार बढ़ते घाटे को देखते हुए बिजली की कीमतों में संशोधन आवश्यक है। आयोग ने इन प्रस्तावों की समीक्षा लगभग पूरी कर ली है और संभावना जताई जा रही है कि यदि इन्हें मंजूरी मिलती है तो 1 अप्रैल के बाद कभी भी बिजली के दाम बढ़ सकते हैं। ऐसा होने पर प्रदेश के लगभग पौने दो करोड़ बिजली उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा असर पड़ेगा।
दिलचस्प बात यह है कि जहां पूर्व और मध्य क्षेत्र की कंपनियां लगातार घाटे से जूझ रही हैं, वहीं पश्चिम क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है। हालांकि पिछले चार वित्तीय वर्षों—2021 से 2024—के बीच पश्चिम कंपनी भी क्रमशः 1,790 करोड़, 1,130 करोड़ और 125 करोड़ रुपये के नुकसान में रही थी। इसके बावजूद वर्ष 2024-25 में कंपनी ने स्थिति संभालते हुए लगभग 730 करोड़ रुपये का लाभ दर्ज किया है। इस उपलब्धि के बाद यह सवाल उठने लगा है कि जब पश्चिम क्षेत्र कंपनी घाटे से बाहर निकलने में सफल हो सकती है, तो अन्य कंपनियां उसके मॉडल को क्यों नहीं अपना पा रही हैं।
ऊर्जा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पश्चिम क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी ने कई महत्वपूर्ण सुधारात्मक कदम उठाए हैं। इनमें बिजली चोरी रोकने के लिए कड़े अभियान चलाना, स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया को तेज करना और नई तकनीकों का इस्तेमाल करना शामिल है। इसके अलावा कंपनी ने बिल वसूली की व्यवस्था को मजबूत किया, फीडर सेपरेशन जैसी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया और डिजिटल मॉनीटरिंग तथा डेटा एनालिटिक्स की मदद से बिजली वितरण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाया। कंपनी का दावा है कि इन उपायों के कारण ही वह नुकसान कम करने और अंततः लाभ की स्थिति में आने में सफल रही है।