पेंशन नियमों में बड़ा बदलाव, इस दिन से बेटियों को मिलेगा माता-पिता की पेंशन का सीधा हक, प्रक्रिया हुई आसान

सरकारी कर्मचारियों और उनके आश्रितों के लिए राहत भरी खबर है। केंद्र और राज्य सरकार के पेंशन नियमों में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। 1 अप्रैल से पारिवारिक पेंशन (Family Pension) के नियमों में बेटियों के अधिकारों को और अधिक सुरक्षित किया गया है। नए नियमों के तहत अब बेटियों को अपने माता-पिता की पेंशन पाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई या दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। यह बदलाव विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है जो अपने माता-पिता पर आर्थिक रूप से निर्भर हैं।

पेंशन और पेंशनभोगी कल्याण विभाग द्वारा जारी निर्देशों के मुताबिक, अब पारिवारिक पेंशन के लिए दावा करना पहले से कहीं ज्यादा आसान होगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह नियम 1 अप्रैल से पूरी तरह प्रभावी हो जाएगा। इसका सीधा लाभ उन हजारों बेटियों को मिलेगा जो अपने माता-पिता पर आश्रित थीं, लेकिन तकनीकी खामियों या रिकॉर्ड में नाम न होने के कारण पेंशन से वंचित रह जाती थीं।

क्या है नया नियम?

नए प्रावधानों के अनुसार, अब सरकारी कर्मचारी को अपनी सेवा के दौरान ही या रिटायरमेंट के समय अपने परिवार का पूरा विवरण देना अनिवार्य होगा। इसमें न केवल पति या पत्नी, बल्कि अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा बेटियों का नाम भी शामिल करना होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पेंशनभोगी की मृत्यु के बाद आश्रित बेटी को अपनी पहचान और पात्रता साबित करने के लिए परेशान न होना पड़े।

पहले के नियमों में अक्सर केवल जीवनसाथी (Spouse) का नाम ही रिकॉर्ड में प्रमुखता से होता था। इसके चलते माता-पिता दोनों की मृत्यु के बाद बेटियों को अपना हक साबित करने में सालों लग जाते थे। अब विभागों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे कर्मचारियों के रिकॉर्ड में पात्र बेटियों का नाम पहले ही अपडेट कर लें।

तलाकशुदा और विधवा बेटियों को बड़ी राहत

इस बदलाव में सबसे बड़ी राहत तलाकशुदा और विधवा बेटियों को मिली है। पुराने नियमों के तहत, अगर पेंशनभोगी की मृत्यु के समय बेटी का तलाक का मामला कोर्ट में लंबित होता था, तो उसे पेंशन मिलने में काफी तकनीकी दिक्कतें आती थीं। नए नियमों में इसे लचीला बनाया गया है। अब अगर तलाक की प्रक्रिया माता-पिता के जीवित रहते शुरू हो चुकी थी, तो भी बेटी पारिवारिक पेंशन की हकदार मानी जाएगी। यह कदम सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पुरानी व्यवस्था और परेशानी

इससे पहले, कई मामलों में देखा गया था कि पेंशन फाइलों (PPO) में बेटियों का नाम अपडेट नहीं होता था। भोपाल सहित कई जिलों में ऐसे मामले लंबित थे जहां बेटियां अपने हक के लिए भटक रही थीं। पुरानी व्यवस्था में स्पष्टता की कमी के कारण विभाग भी फाइलें अटका देते थे। अब 1 अप्रैल से लागू हो रहे नियमों ने इस अस्पष्टता को खत्म कर दिया है।

जानकारों का कहना है कि यह फैसला न केवल प्रशासनिक सुधार है, बल्कि महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी एक ठोस कदम है। इससे आश्रित महिलाओं को वह आर्थिक सुरक्षा मिल सकेगी जिसकी वे हकदार हैं।