अभिव्यक्ति की आजादी और social media के मंच


ज्ञानेंद्र रावत
वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद्

रणवीर इलाहबादिया प्रकरण के बाद एक बार फिर सोशल मीडिया ( social media ) की सामग्रियों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अभिव्यक्ति की आजादी की अपनी एक सीमा और मर्यादा है। इसलिए हरेक नागरिक का कर्तव्य है कि वह इस सीमा और मर्यादा का सम्मान रखे। जरूरत देश के सभी नागरिकों को इसका प्रहरी बनने और निहित स्वार्थ से प्रेरित लोगों के उद्देश्यों की पूर्ति से इसे बचाने की है।

social media को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

वह बात दीगर है कि यूट्यूबर-पॉडकास्टर रणवीर इलाहबादिया को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के गहरे निहितार्थ हैं। देश की शीर्ष अदालत ने रणवीर से पूछा है कि इंडियाज गाट लेटेंट के कार्यक्रम में आपने जो कुछ कहा, इस देश में यदि वह अश्लीलता नहीं है तो फिर अश्लीलता के मानक क्या हैं? न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने उचित ही कहा है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी बोलने का लाइसेंस नहीं मिल जाता। रणवीर के दिमाग में गंदगी भरी है जो उसने शो पर उगल दी। रणवीर और उनके साथियों ने जैसी विकृत मानसिकता का प्रदर्शन किया और भाषा का इस्तेमाल किया, वह निंदनीय है। जो शब्द उन्होंने चुने, उनसे माता-पिता, बहनें-बेटियां व भाई शर्मिंदा होंगे। यहां तक कि वह भाषा समाज को भी शर्मिंदगी महसूस कराती है। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि अगले आदेश तक रणवीर शो नहीं कर सकेगा। उसे पासपोर्ट जमा करना होगा ताकि वह विदेश न जा सके। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की पीठ ने यह भी कहा कि केन्द्र इस बाबत इंटरनेट मीडिया की अश्लील सामग्री पर लगाम लगाये। यदि इस मामले में सरकार कुछ करने के लिए तैयार है तो हमें खुशी होगी अन्यथा हम इसे ऐसे नहीं छोड़ सकते जैसे कि तथाकथित यूट्यूब चैनल इसका दुरुपयोग कर रहे हैं और यह सब चीजें चल रही हैं। हम इस मुद्दे की महत्ता और संवेदनशीलता को नजरंदाज नहीं कर सकते। यहां यह गौरतलब है कि इस कार्यक्रम के प्रसारण के कुछ ही घंटों बाद हुए भारी विरोध के बाद रणवीर को न सिर्फ सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पडी थी, बल्कि यूट्यूब से इस श्रृंखला के सारे ऐपिसोड भी हटाने पड़े थे। लेकिन देश में जगह-जगह रणवीर और उनके साथियों के खिलाफ दर्ज मुकदमों ने अश्लील सामग्री के मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श के केन्द्र में ला दिया है। यह सच है कि यह पूरा मामला अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा है। इस सचाई को भी हम दरकिनार नहीं कर सकते कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर बहुतेरे लोग अक्सर विकृत मानसिकता का परिचय देते रहते हैं और सोशल मीडिया के मंच अब अश्लीलता-अभद्रता की सारी हदें पार करने लगे हैं। हालांकि यह जानते-समझते कि इन पर गलत, अश्लील और भद्दे कमेंट या पोस्ट करना एक प्रकार से अपराध की श्रेणी में आता है।उसके बाद भी इन पर अंकुश न लगना खेद का विषय है। जबकि ऐसा करने वाले यह भली भांति जानते हैं कि भारतीय समाज संस्कृति और संस्कारों के संदर्भ में कितना संवेदनशील है, धनी है। वह इस तरह के आचरण को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं कर सकता। और न वह इसको किसी भी दृष्टि से जायज ठहरा सकता है। लेकिन दुखदायी यह है कि हम पाश्चात्य संस्कृति की आड़ में अपनी संस्कृति, अपने सामाजिक संस्कारों, मूल्यों, प्रतिमानों को पीछे छोड़ते हुए मर्यादा की सारी हदें पार कर अपने नैतिक मूल्यों, आदर्शों को तिरोहित करते जा रहे हैं। इसके बावजूद हकीकत यही है कि ऐसी प्रवृत्ति का हमारे समाज और भद्रलोक ने हमेशा न केवल विरोध किया है बल्कि इसका पूर्णरूपेण बहिष्कार भी किया है। यही नहीं अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार की हिफाजत करते हुए लगातार सार्वजनिक और सामाजिक शुचिता तथा मानवीय संबंधों की गरिमा की पैरोकारी की गयी है। इस दृष्टि से यूट्यूबर रणवीर इलाहबादिया के आचरण को किसी भी स्तर पर स्वीकार और उचित नहीं ठहराया जा सकता बल्कि उसे निकृष्टतम ही कहा जायेगा।
रणवीर इलाहबादिया ने जो कहा वह वास्तव में आपत्तिजनक है, निंदनीय है, इसमें दो राय नहीं है। लेकिन क्या किसी राजनेता द्वारा किसी अभिनेत्री या सांसद के गालों की तुलना सडक़ से किया जाना, किसी विधायक द्वारा सदन में मोबाइल पर अश्लील फिल्में देखना, राजनेता द्वारा लडक़ों से गलतियां हो जाती हैं जैसी टिप्पणियां की जाती हैं, आपत्तिजनक नहीं हैं। उसमे समाज के अलंबरदारों की बेचैनी नहीं दिखती। इन्हें क्यों दरकिनार कर दिया जाता है। क्या इसलिए कि वे राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा की गयी हैं। ऐसे मामलों पर हमारे द्वारा चुप्पी साध लेना कहां का न्याय है। नियम तो सभी के लिए एक जैसे होने चाहिए। कुछ को निशाना बनाना और कुछ को दरकिनार कर देना किस दंड प्रक्रिया का हिस्सा है? यह विचार का विषय है। समाजविज्ञानियों की चिंता गौरतलब है कि सिर्फ एक घटना से हमें पूरी रचनाधर्मिता पर सवाल नहीं उठाना चाहिए। लेकिन क्या कामेडी के नाम पर कुछ भी कहना, वह चाहे अपमानजनक भाषा हो, अनुचित टिप्पणी हो या कुछ और ठीक नहीं है। इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। और नहीं कामेडी के नाम पर ऐसे कंटेंट जो सभ्य समाज को मान्य न हों, स्वीकार्य हैं। यह ठीक है कि सोशल मीडिया की पहुंच घर-घर में है, वहां वह लोकप्रिय भी है क्योंकि वह एक असीमित संसार है जहां हर तरह की सामग्री बिना किसी प्रतिबंध के उपलब्ध है। इस सम्बन्ध में कुछ का मानना है कि चूंकि सोशल मीडिया एक विशाल मंच है जिस पर हर तरह की सामग्री मौजूद है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम क्या देखें और क्या नहीं। हां अश्लील सामग्रियों के प्रसार को रोकने के लिए ऐसा तंत्र विकसित किया जाये जिससे हर क्षण कहें या कुछ कंटेंट के बाद आने वाली अश्लील सामग्री पर अंकुश लग सके। यह सोशल मीडिया के कंटेंट की निगरानी के तंत्र को और सक्रिय और प्रभावी बनाये बिना असंभव है। यह सही है कि सोशल मीडिया के मंचों पर अश्लीलता फूहड़पन की सीमा भी लांघ चुकी है।ऐसे कंटेंट पर निर्माता किसी किस्म की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हैं जबकि यह दायित्व उनका होना चाहिए। यह भी कि उनका दायित्व है कि वे ऐसी सामग्री परोसें जो सभ्य समाज को मान्य हों व परिवार के साथ उन्हें देखा जा सके। लेकिन इस सबके लिए हम भी उतने ही दोषी हैं। कारण यह कि मौजूदा हालात में उपयोगी, अछे, संवेदनशील कार्यक्रम को दर्शक ही नहीं मिलते जबकि अश्लील, फूहड़ और नंगापन से भरपूर कार्यक्रमों को देखने वालों की तादाद बेशुमार है। क्योंकि सोशल मीडिया के जाये समाज में ऐसा वर्ग तैयार हो गया है जो सामाजिक मूल्यों के संरक्षण की अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह लापरवाह है। कारण वह अपनी आजादी को असीमित मान बैठा है। ऐसे फूहड़ व अश्लील कार्यक्रमों को समाज के सहयोग के बिना रोक पाना असंभव है। यह तभी संभव है जब समाज उनका पूरी तरह बहिष्कार करे। सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार के दौर में इस पर अंकुश लगाना बेहद जरुरी है ताकि पारिवारिक मूल्यों की रक्षा हो सके। इसपर अंकुश हेतु तंत्र को अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति भी संवेदनशील रहना होगा। कारण यह हमारी संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी शर्त है। यह जानते हुए कि ऐसे कृत्य या आचरण केवल और केवल व्यक्तिगत आर्थिक लाभ की दृष्टि से किये जा रहे हैं, निश्चित ही सीमित करने योग्य हैं। उपर अंकुश समय की मांग है। अन्यथा ऐसे कृत्य सामाजिक बिखराव और समाज को अनैतिकता के गर्त में ढकेलने के कारण बनेंगे। इसमें दो राय नहीं।