राजस्थान में ‘गांव ग्वाला योजना’ का आगाज़: अब गाय चराने वालों की भर्ती करेगी सरकारी 

Jaipur News: राजस्थान की भजनलाल सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और प्राचीन परंपराओं को सहेजने की दिशा में एक अनूठा कदम उठाया है। राज्य में ‘गांव ग्वाला योजना’ की शुरुआत की गई है, जिसके तहत अब गायों की देखभाल करने वाले ग्वालों को न केवल सामाजिक सम्मान मिलेगा, बल्कि उन्हें सम्मानजनक रोजगार से भी जोड़ा जाएगा।
इस योजना का मुख्य उद्देश्य विलुप्त होती गोचर परंपरा को पुनर्जीवित करना और ग्रामीण युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर आय के साधन पैदा करना है।
शिक्षा मंत्री ने किया योजना का श्रीगणेश
इस महत्वाकांक्षी योजना की औपचारिक शुरुआत राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन सिंह दिलावर ने कोटा जिले के रामगंजमंडी क्षेत्र स्थित खेड़ली गांव से की। उद्घाटन समारोह के दौरान एक भावुक और प्रेरक दृश्य देखने को मिला, जब मंत्री ने 14 गांवों से चयनित ग्वालों को मंच पर बुलाकर साफा पहनाया और माला पहनाकर सम्मानित किया।
मंत्री दिलावर ने इस अवसर पर कहा, “गाय हमारी संस्कृति और स्वास्थ्य का आधार है। गाय का दूध बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए अमृत समान है। जो बच्चे गौ-दुग्ध का सेवन करते हैं, वे अधिक बुद्धिमान और ऊर्जावान बनते हैं।”
कैसे काम करेगी यह योजना?
योजना का ढांचा बेहद व्यवस्थित रखा गया है ताकि पशुपालकों और ग्वालों दोनों को सुविधा हो:
  • नियुक्ति का मानक: प्रत्येक 70 गायों पर एक ग्वाला नियुक्त किया जाएगा। यदि गांव में गायों की संख्या अधिक है, तो दो या तीन ग्वाले भी रखे जा सकते हैं।
  • कार्य प्रणाली: ग्वाले की जिम्मेदारी होगी कि वह सुबह घर-घर जाकर गायों को एकत्रित करे, उन्हें दिनभर निर्धारित गोचर भूमि पर चराए और शाम को सुरक्षित उनके स्वामियों के घर तक पहुँचाए।
  • वेतन और फंडिंग: चयनित ग्वाले को प्रति माह 10,000 रुपये का मानदेय दिया जाएगा। विशेष बात यह है कि यह राशि सीधे सरकारी खजाने के बजाय स्थानीय भामाशाहों (दानदाताओं) और जन-सहयोग के माध्यम से जुटाई जाएगी।
सांस्कृतिक और स्वास्थ्य संबंधी महत्व
सरकार का मानना है कि इस योजना से बेसहारा घूमने वाली गायों की समस्या का समाधान होगा और चरागाहों का संरक्षण सुनिश्चित होगा। मंत्री दिलावर ने भैंस के दूध की तुलना में देसी गाय के दूध को प्राथमिकता देने पर जोर देते हुए कहा कि इससे बच्चों में सुस्ती नहीं आती और वे कुशाग्र बनते हैं।
रोजगार और सम्मान का नया मॉडल
‘गांव ग्वाला योजना’ केवल एक आर्थिक पहल नहीं है, बल्कि यह उस वर्ग को सामाजिक मुख्यधारा में लाने का प्रयास है जो सदियों से निस्वार्थ भाव से गौ-सेवा कर रहा है। बिना किसी भारी सरकारी बजट के, भामाशाहों के सहयोग से चलने वाला यह मॉडल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मिसाल बन सकता है।