राजेश राठौर
EXCLUSIVE
अब बातचीत भी हो गई, आयोजन भी हो गया, करोड़ों का निवेश ( investment ) कागज पर आ गया, अब जमीन पर उतारना सबसे बड़ी चुनौती है। मध्यप्रदेश के इतिहास की आठवीं ग्लोबल इन्वेस्टर समिट आखिरकार हो गई। मोहन यादव सरकार की पहली इन्वेस्टर मीट थी जिसमें मुख्यमंत्री के अनुसार 30 लाख 77 हजार करोड़ का निवेश आया है, जिसके कारण 20 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलेगा। सोमवार-मंगलवार को दो दिन तक चली मैराथन बैठक और मुख्यमंत्री डा. यादव की उद्योगपतियों से सीधी बात हुई है। अब बातचीत भी हो गई, आयोजन भी हो गया, करोड़ों का निवेश कागज पर आ गया, अब जमीन पर उतारना सबसे बड़ी चुनौती है।
शिवराज के कार्यकाल में 20 फीसदी ही investment जमीन पर आ पाया
शिवराज के कार्यकाल में हुई 7 इन्वेस्टर समिट में आए इन्वेस्टमेंट ( investment ) के प्रस्ताव तो लाखों-करोड़ों के नहीं, अरबों-करोड़ों के हो गए थे लेकिन वास्तव में निवेश बमुश्किल 20 फीसदी जमीन पर उतर पाया। सवाल इस बात का उठता है कि शिवराज सरकार भी लंबे-चौड़े वादे कर चुकी है, रिजल्ट तो सबके सामने हैं। हालांकि 20 साल के भाजपा सरकार के कार्यकाल में इस बहाने काम काफी हुए। नए इंडस्ट्री एरिये भी डेवलप हुए, देश और दुनिया में मध्यप्रदेश का नाम पहुंचा। अब नई सरकार तो भाजपा की है लेकिन मुख्यमंत्री बदल गए हैं, शिवराज सिंह चौहान की जगह डा. मोहन यादव हैं। हालांकि यादव ने शुरुआत में ही कह दिया था कि जो उद्योगपति वास्तव में काम करना चाहते हैं हम उन्हीं से एग्रीमेंट करेंगे, इस बात को सच मान लिया जाए तो 30 लाख 77 हजार करोड़ के प्रस्ताव में से कितने प्रस्ताव वास्तव में जमीन पर उतर पाएंगे, यह तो आने वाला वक्त ही बता पाएगा। अभी तो इंदौर की बजाय भोपाल में हुए समिट की चर्चा है, सर्वाधिक प्रस्ताव के आधार पर एग्रीमेंट की खबर है। मुकेश अंबानी भले ही नहीं आए लेकिन उनकी कंपनी के प्रतिनिधियों ने निवेश के प्रस्ताव के आधार पर एग्रीमेंट किए हैं। पीथमपुर में बाबा रामदेव जमीन लेकर बैठे हुए हैं लेकिन सालों से उन्होंने कुछ नहीं किया। ऐसे कई उद्योगपति हैं जिन्होंने जमीन तो ले ली लेकिन काम शुरू नहीं किया। सवाल इस बात का उठता है कि सरकार ऐसे लोगों से कैसे निपटेगी। हालांकि दूसरे उद्योगपतियों से जमीन वापस लेने की बात सामने आई है। अब मोहन यादव सरकार के अफसर निवेश जमीन पर लाने के लिए कितनी ईमानदारी से काम करेंगे। हालांकि समिट के समापन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव के सामने मुख्य सचिव अनुराग जैन ने यह जरूर कहा कि इंडस्ट्री डिपार्टमेंट के स्तर पर हर हफ्ते समीक्षा होगी। मुख्य सचिव खुद हर महीने अपने स्तर पर समीक्षा करेंगे। जिन उद्योगपतियों ने एग्रीमेंट किए हैं वो काम शुरू कर रहे हैं या नहीं, जमीन उद्योगपतियों को मिल गई है या नहीं, उद्योग शुरू करने में पहले 38 विभागों की अनुमति लेना पड़ती थी, अब 10 विभागों की अनुमति लेना पड़ेगी, इन विभागों की अनुमतियां मिलने में उद्योगपतियों को परेशानी तो नहीं होगी। फैक्टरी बनाने से लेकर चालू करने में कितना समय लगेगा, ये देखना भी जरूरी है, मध्यप्रदेश के कितने बेरोजगारों को कंपनियांं नौकरी दे पाएगी।
हालांकि स्किल डेपलपमेंट की मध्यप्रदेश में कमी जरूर है इसलिए इंडस्ट्री वालों को मध्यप्रदेश के बाहर के युवाओं को नौकरी देना पड़ती है। दरअसल अभी भी इस बात की जरूरत है कि जिन उद्योगपतियों ने पूर्व में करार किए थे और यदि उन्होंने फैक्टरी शुरू नहीं की है तो उनसे सरकार को जमीन वापस लेना चाहिए। सभी उद्योग समय पर शुरू हो जाएं इसके लिए 365 दिन काम करना पड़ेगा। कहना बड़ा आसान है, एग्रीमेंट करना बहुत सरल है लेकिन वास्तव में निवेश जमीन पर उतारना कठिन है। हालांकि सरकार चाह ले तो सब कुछ संभव है लेकिन कई अफसर ऐसे होते हैं जो ‘लकीर के फकीर’ होते हैं, उद्योगपतियों को परेशान करते हैं, ऐसे अफसरों पर भी नकेल कसना जरूरी है। इसके अलावा मध्यप्रदेश में बेरोजगारों के लिए स्किल डेवलपमेंट पर भी ध्यान देना जरूरी है। अभी सरकारी तौर पर इस पर काम नहीं हो रहा है। ऐसे में युवाओं को नई इंडस्ट्री का फायदा नहीं मिल पाएगा। वैसे बाबा महाकाल की कृपा सरकार पर हो तो सारे उद्योग भी लग सकते हैं, हम भी यही चाहते हैं…बाकी अफसरों की मनमर्जी।