हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, “भोजशाला है मंदिर”

इंदौर। धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद पर आखिरकार हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुना दिया। इंदौर खंडपीठ ने साफ कहा हैकि — “भोजशाला एक मंदिर है”, और इसी के साथ हिंदू पक्ष को नियमित पूजा-पाठ का अधिकार भी दे दिया गया है। दशकों से चले आ रहे इस विवाद में अदालत का यह फैसला हिंदू पक्ष के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस स्थल पर हिंदू पूजा-अर्चना की परंपरा कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई। साथ ही ऐतिहासिक दस्तावेज और साहित्य यह साबित करते हैं कि यह स्थान परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत शिक्षा और साधना का प्रमुख केंद्र था, जिसे भोजशाला के नाम से जाना जाता था।

मंदिर या मस्जिद? कोर्ट ने क्या माना
मामले की सबसे अहम बहस यही थी कि भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना जाए या कमाल मौला मस्जिद। हाई कोर्ट ने ASI की वैज्ञानिक रिपोर्ट और पुरातात्विक तथ्यों पर भरोसा जताते हुए कहा कि पुरातत्व एक विज्ञान है और उसके निष्कर्षों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह संरक्षित स्मारक है और इसके संरक्षण का पूरा अधिकार ASI के पास रहेगा।

मुस्लिम पक्ष के लिए भी खुला रास्ता
फैसले में अदालत ने मुस्लिम पक्ष को भी राहत देते हुए कहा कि वे मस्जिद के लिए अलग जमीन की मांग कर सकते हैं। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 तथा अयोध्या फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक अधिकारों और पुरातात्विक साक्ष्यों  दोनों का संतुलन जरूरी है।

फैसले के बीच पढ़ी गई नमाज
दिलचस्प बात यह रही कि जिस समय अदालत फैसला सुना रही थी, उसी दौरान शुक्रवार होने के कारण भोजशाला परिसर में नमाज अदा की जा रही थी जो कि भोजशाला में आखिरी नमाज साबित हुई। भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच नमाज शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई। प्रशासन पहले से अलर्ट मोड पर था।  शहर में नाकाबंदी, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग और करीब 1000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी।

98 दिन चला था ASI का सर्वे
हाई कोर्ट के आदेश पर ASI ने मार्च 2024 में वैज्ञानिक सर्वे शुरू किया था, जो करीब 98 दिनों तक चला। जुलाई 2024 में सौंपी गई लगभग 2000 पन्नों की रिपोर्ट में दावा किया गया कि मौजूदा ढांचे में पहले से मौजूद मंदिर के अवशेष, स्तंभ और नक्काशीदार पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था। सर्वे में परमारकालीन मूर्तियां, शिलालेख और कलात्मक संरचनाएं भी मिली थीं।

क्या है भोजशाला विवाद का इतिहास?
भोजशाला विवाद कई दशक पुराना है, लेकिन 2022 में “हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस” की याचिका के बाद यह मामला फिर सुर्खियों में आया। 2003 के ASI आदेश के अनुसार हिंदुओं को हर मंगलवार पूजा और मुस्लिम समुदाय को हर शुक्रवार नमाज की अनुमति दी गई थी।

तीन पक्ष, तीन दावे
हिंदू पक्ष का दावा है कि यह 11वीं सदी में राजा भोज द्वारा स्थापित सरस्वती मंदिर और गुरुकुल है। मुस्लिम पक्ष इसे सदियों पुरानी कमाल मौला मस्जिद बताता है और ASI रिपोर्ट को पक्षपाती कहता रहा है।  वहीं जैन समाज ने भी दावा किया कि यह मूल रूप से जैन गुरुकुल और मंदिर था, और यहां मिली वाग्देवी प्रतिमा वास्तव में जैन यक्षिणी अंबिका की है। धार भोजशाला का यह फैसला अब सिर्फ एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और राजनीति के संगम पर खड़ा फैसला है।