होली की खुशियां बरकरार रखें, बच्चों की सेहत रहे सुरक्षित, जानें क्या करें और किन बातों से बचें

होली का उत्साह बच्चों में सबसे ज्यादा दिखता है। रंग, मिठाई, गाना-बजाना और दोस्तों के साथ खेलने की वजह से वे लंबे समय तक बाहर रहते हैं। इसी दौरान लापरवाही से त्वचा, आंख और सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि होली के दिन बच्चों को सिर्फ रंगों से नहीं, माहौल से भी सुरक्षित रखना जरूरी है। माता-पिता की भूमिका यहां सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि छोटे बच्चे अक्सर जोखिम को समझ नहीं पाते।

सुपर स्पेशलिस्टी हॉस्पिटल के अधीक्षक ने बच्चों की होली को लेकर कुछ साफ सुझाव दिए हैं। उनका कहना है कि बाजार में बिकने वाले ज्यादातर रंग केमिकल आधारित होते हैं। ये रंग खासकर बच्चों के लिए ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकते हैं, क्योंकि उनकी त्वचा वयस्कों की तुलना में अधिक नाजुक होती है। ऐसे रंगों के संपर्क से एलर्जी, खुजली, रैशेज और आंखों में जलन जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।

केमिकल रंगों से क्यों बढ़ता है खतरा

डॉक्टर के अनुसार, होली पर जो तेज और चटक रंग बाजार में आसानी से मिलते हैं, उनमें कई बार ऐसे रासायनिक तत्व होते हैं जो त्वचा पर खराब असर डालते हैं। बच्चे जब खेलने के दौरान बार-बार चेहरा, आंख या मुंह छूते हैं, तो परेशानी बढ़ सकती है। आंखों में रंग जाने पर जलन और लालिमा बढ़ना आम शिकायत बन जाती है। त्वचा पर लंबे समय तक रंग लगे रहने से खुजली और रैशेज होने का खतरा भी रहता है। इसलिए बच्चों को केमिकल रंगों से दूर रखना प्राथमिक सावधानी मानी जा रही है।

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बच्चों के लिए हर्बल या नेचुरल रंग चुने जाएं। ये रंग घर पर भी बनाए जा सकते हैं और तुलनात्मक रूप से सुरक्षित माने जाते हैं। चुकंदर, हल्दी, पालक और गुलाबजल जैसी प्राकृतिक चीजों से बने रंग बेहतर विकल्प हो सकते हैं। ऐसे रंगों का उपयोग करने से त्वचा और आंखों पर दुष्प्रभाव का जोखिम कम किया जा सकता है। परिवार अगर पहले से रंगों की तैयारी करे, तो बच्चों के लिए सुरक्षित होली का माहौल बनाना आसान हो जाता है।

होली खेलने की जगह भी उतनी ही जरूरी

सुरक्षा सिर्फ रंगों तक सीमित नहीं है। बच्चों को कहां और कैसे होली खेलने दिया जा रहा है, यह भी अहम है। भीड़भाड़ वाले इलाकों या सड़क किनारे होली खेलने से दुर्घटना का खतरा बढ़ता है। तेज आवाजाही वाले स्थानों पर धक्का-मुक्की, फिसलन और चोट की आशंका रहती है। इसलिए माता-पिता को बच्चों के लिए पहले से सुरक्षित स्थान तय करना चाहिए।

डॉ श्रीवास्तव ने बच्चों को घर के आंगन या पार्क जैसे नियंत्रित स्थानों पर होली खेलने के लिए प्रोत्साहित करने की सलाह दी है। ऐसे स्थानों पर निगरानी आसान रहती है और किसी भी समस्या में तुरंत मदद मिल सकती है। कई परिवार छत पर भी होली खेलते हैं, लेकिन डॉक्टर ने स्पष्ट किया है कि बच्चों को छत पर बिना निगरानी के नहीं भेजना चाहिए। ऊंचाई वाले स्थानों पर थोड़ी सी लापरवाही भी गंभीर दुर्घटना में बदल सकती है।

होली के दौरान बच्चों का उत्साह स्वाभाविक है, लेकिन सुरक्षा नियम भी उतने ही जरूरी हैं। यदि रंगों का चुनाव सही हो, जगह सुरक्षित हो और बड़ों की निगरानी बनी रहे, तो त्योहार का आनंद बिना स्वास्थ्य जोखिम के लिया जा सकता है। परिवारों के लिए सबसे व्यावहारिक तरीका यही है कि पहले सुरक्षा की योजना बनाएं और फिर बच्चों को खुलकर त्योहार मनाने दें।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की यह सलाह खासकर उन अभिभावकों के लिए उपयोगी है जिनके घर छोटे बच्चे हैं। त्योहार की खुशियां तभी टिकाऊ रहती हैं जब उसके बाद इलाज या परेशानी की नौबत न आए। इसलिए इस होली बच्चों के लिए सुरक्षित रंग, सुरक्षित जगह और सतत निगरानी को प्राथमिकता देना जरूरी है।