Rupee vs Dollar: भारतीय मुद्रा बाजार में शुक्रवार को एक बार फिर उतार-चढ़ाव का दौर देखने को मिला। पिछले कारोबारी सत्र में शानदार रिकवरी दिखाने वाला रुपया शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर की ‘हुंकार’ के आगे टिक नहीं सका।
शुरुआती कारोबार में ही भारतीय रुपया 8 पैसे टूटकर 90.69 के स्तर पर पहुंच गया। वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती और घरेलू शेयर बाजार में मची हाहाकार ने रुपये की कमर तोड़ दी।
क्यों सहम गया रुपया?
विदेशी मुद्रा विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये में आई इस गिरावट के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण रहे:
व्हाइट हाउस की ‘फैक्ट शीट’ का डर: हाल ही में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर बाजार में उत्साह था, लेकिन व्हाइट हाउस द्वारा जारी एक आधिकारिक दस्तावेज (फैक्ट शीट) ने निवेशकों को चिंता में डाल दिया। इस शीट में संकेत दिए गए हैं कि समझौते के तहत भारत को अमेरिकी कृषि और औद्योगिक उत्पादों पर आयात शुल्क में बड़ी कटौती करनी पड़ सकती है, जिससे व्यापार संतुलन बिगड़ने का डर है।
मजबूत डॉलर इंडेक्स: वैश्विक बाजारों में अमेरिकी डॉलर की मांग लगातार बनी हुई है। डॉलर इंडेक्स 96.94 पर पहुंच गया है, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ गया है।
घरेलू शेयर बाजार में गिरावट: शुक्रवार को सेंसेक्स और निफ्टी में भारी बिकवाली देखी गई। सेंसेक्स करीब 683 अंक और निफ्टी 200 अंकों से ज्यादा टूट गया, जिसके कारण विदेशी निवेशकों का भरोसा डगमगाया।
सरकार का रुख: घबराने की जरूरत नहीं
रुपये और व्यापार समझौते पर बढ़ती चिंताओं के बीच वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि भारत ने अपने संवेदनशील क्षेत्रों (विशेषकर कृषि और छोटे उद्योगों) की सुरक्षा सुनिश्चित की है।
अंतरिम समझौते में महत्वपूर्ण खंडों को संरक्षित रखा गया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि मार्च के अंत तक इस समझौते को अंतिम रूप दे दिया जाएगा, जो भविष्य में स्थिरता लाएगा।
बाजार के अन्य आंकड़े
कच्चा तेल: अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 67.41 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है। तेल की कीमतों में मामूली गिरावट भारत के लिए राहत की बात है, क्योंकि इससे आयात बिल कम होता है।
एफ.आई.आई (FII): विदेशी संस्थागत निवेशकों ने गुरुवार को करीब 108.42 करोड़ रुपये की खरीदारी की थी, लेकिन यह निवेश रुपये को गिरने से बचाने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुआ।
निष्कर्ष: फिलहाल डॉलर की मजबूती और अमेरिका की नई व्यापारिक शर्तों ने रुपये के लिए चुनौतियां बढ़ा दी हैं। हालांकि, सरकारी हस्तक्षेप और समझौते की अंतिम शर्तों के स्पष्ट होने के बाद ही रुपये की सही दिशा तय हो पाएगी।