इस साल भारत का गणतंत्र दिवस सिर्फ परेड और सांस्कृतिक झांकियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह देश की आर्थिक ताकत और कूटनीतिक समझ का भी बड़ा प्रदर्शन बनने जा रहा है। 26 जनवरी को जब दिल्ली में रिपब्लिक डे का जश्न होगा, उसी समय वैश्विक व्यापार के मंच पर एक ऐसा फैसला आकार ले रहा होगा, जिसकी गूंज अमेरिका से लेकर चीन तक सुनाई दे सकती है।
भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल इसे महज एक समझौता नहीं, बल्कि “मदर ऑफ ऑल डील्स” यानी अब तक का सबसे बड़ा व्यापारिक सौदा बता चुके हैं।
दो दशक पुरानी बातचीत, अब दिख रही है सफलता
भारत और यूरोपीय संघ के बीच FTA को लेकर बातचीत की शुरुआत साल 2007 में हुई थी। दोनों ही पक्ष जानते थे कि यह साझेदारी फायदेमंद हो सकती है, लेकिन हितों के टकराव के कारण रास्ता आसान नहीं रहा। 2013 तक आते-आते बातचीत पूरी तरह ठप पड़ गई। यूरोपीय संघ भारत में कारों और शराब पर आयात शुल्क कम करवाना चाहता था, जबकि भारत डेटा सुरक्षा, श्रमिक अधिकार और घरेलू उद्योगों की सुरक्षा को लेकर चिंतित था।
हालांकि, 2020 के बाद वैश्विक हालात तेजी से बदले। कोरोना महामारी, सप्लाई चेन संकट और बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों ने यह साफ कर दिया कि किसी एक देश या बाजार पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। इसी सोच ने दोनों पक्षों को फिर से बातचीत की मेज पर ला खड़ा किया। जून 2022 में वार्ता दोबारा शुरू हुई और अब 2026 की शुरुआत में यह सौदा लगभग तय माना जा रहा है।
क्या भारत में सस्ती होंगी लग्जरी कारें और विदेशी वाइन?
इस समझौते को लेकर आम लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इससे उन्हें क्या फायदा होगा। यूरोपीय संघ की प्रमुख मांग यह है कि भारत यूरोप से आने वाली कारों और शराब पर लगने वाले भारी आयात शुल्क को कम करे। फिलहाल विदेशी कारों पर 100 प्रतिशत तक टैक्स लगता है, जिससे वे बेहद महंगी हो जाती हैं। यदि FTA लागू होता है, तो यूरोपीय कारें, वाइन और अन्य लग्जरी उत्पाद भारतीय बाजार में पहले से सस्ते हो सकते हैं।
हालांकि, भारत सरकार इस मुद्दे पर बेहद सतर्क है। ऑटोमोबाइल और स्टील जैसे सेक्टर में घरेलू उद्योगों को नुकसान पहुंचने का खतरा बना हुआ है। खासतौर पर स्टील आयात को लेकर चिंता है कि बिना नियंत्रण के आयात से भारतीय कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है।
खेती और डेयरी भारत की ‘रेड लाइन’
इस समझौते में कृषि और डेयरी सेक्टर भारत के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दे बने हुए हैं। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका से कोई समझौता नहीं करेगी। डेयरी और कृषि उत्पादों को पूरी तरह खोलना भारत के लिए संभव नहीं है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों पक्ष किसी ऐसे बीच के रास्ते पर काम कर रहे हैं, जिससे यूरोपीय संघ की मांगें भी आंशिक रूप से पूरी हों और भारत के किसानों का हित भी सुरक्षित रहे।
भारतीय निर्यातकों के लिए खुल सकता है बड़ा बाजार
भारत के लिए यह डील सिर्फ आयात शुल्क घटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि असली फायदा निर्यात के मोर्चे पर मिलने वाला है। अभी भारतीय कपड़ा, टेक्सटाइल और चमड़े के उत्पादों पर यूरोप में 12 से 16 प्रतिशत तक टैक्स लगता है। वहीं, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों को रियायतें मिली हुई हैं, जिससे भारतीय कंपनियां प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाती हैं।
FTA के बाद भारतीय टेक्सटाइल, लेदर प्रोडक्ट्स, फार्मा और इलेक्ट्रिकल मशीनरी को यूरोपीय बाजारों में समान अवसर मिलेगा। इससे भारत में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, खासकर कपड़ा उद्योग में।
आईटी और सर्विस सेक्टर को मिलेगा नया बूस्ट
इस समझौते का लाभ सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित नहीं रहेगा। भारत का आईटी और सर्विस सेक्टर, जो पहले से ही वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति में है, उसे भी यूरोप में आसान नियमों और सरल वीजा प्रक्रियाओं का फायदा मिल सकता है। इससे भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए यूरोप में काम करना और भी सुगम हो जाएगा।
अमेरिका-चीन तनाव के बीच भारत का रणनीतिक कदम
इस डील की टाइमिंग बेहद अहम मानी जा रही है। अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ भारतीय निर्यातकों के लिए चुनौती बने हुए हैं, वहीं चीन पर अत्यधिक निर्भरता को अब जोखिम के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे माहौल में यूरोपीय संघ भारत के लिए एक मजबूत और भरोसेमंद साझेदार बनकर उभरा है।
साल 2024 में भारत और EU के बीच द्विपक्षीय व्यापार 120 अरब यूरो तक पहुंच चुका था और इस समझौते के बाद इसके और बढ़ने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही 27 जनवरी को औपचारिक घोषणा हो या न हो, लेकिन भारत और यूरोपीय संघ के बीच यह ऐतिहासिक सौदा अब फिनिश लाइन के बेहद करीब है।