मध्य प्रदेश विधानसभा में इंदौर नगर निगम से जुड़े प्रश्न के गलत जवाब का मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई तक पहुंच गया है। नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने विधायक महेंद्र हार्डिया के सवाल के जवाब में बताया था कि इंदौर में सफाई संरक्षकों का एक भी पद भरा नहीं है। बाद में यह जानकारी तथ्यात्मक रूप से गलत पाई गई। इसके बाद नगर निगम की स्थापना शाखा में जिम्मेदारी तय करते हुए कार्यालय अधीक्षक हरीश श्रीवास्तव को निलंबित किया गया और लिपिक अतुल वाजपेयी की सेवा समाप्त करने का आदेश जारी हुआ।
अपर आयुक्त के आदेश में कहा गया कि विधायक के प्रश्न का जवाब संचालनालय को भेजा गया था, जो त्रुटिपूर्ण पाया गया। जांच में यह भी दर्ज किया गया कि जवाब कार्यालय अधीक्षक के माध्यम से तैयार कराकर प्रेषित किया गया। आदेश में उल्लेख है कि महत्वपूर्ण प्रकरण में अपेक्षित रुचि नहीं दिखाई गई, इसलिए निलंबन के साथ विभागीय जांच शुरू की जा रही है।
“विधायक द्वारा पूछे सवाल का संचालनालय को भेजा जवाब त्रुटिपूर्ण पाया गया।” — अपर आयुक्त, आदेश
इसी प्रकरण में लिपिक अतुल वाजपेयी, जो विनियमित कर्मचारी थे, के स्तर पर भी जवाब तैयार होना दर्ज किया गया। आदेश में कहा गया कि महत्वपूर्ण कार्य में पर्याप्त रुचि नहीं लेने पर उन्हें हाजिरी मुक्त किया जाता है और पारिश्रमिक भुगतान पर तत्काल रोक लगाई जाती है। इसके साथ ही उनकी सेवा समाप्त करने की कार्रवाई लागू कर दी गई।
विधानसभा में पूछा गया था अमले और रिक्त पदों का ब्योरा
भाजपा विधायक महेंद्र हार्डिया ने विधानसभा में इंदौर नगर निगम के स्वीकृत पद, कार्यरत पद और रिक्त पदों की स्थिति पर सवाल लगाया था। उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या कर्मचारियों की कमी के कारण एक ही अधिकारी को कई स्थानों का अतिरिक्त प्रभार दिया जा रहा है। जवाब में मंत्री की ओर से कहा गया कि निगम सीमा विस्तार के कारण अधिकारियों को एक से अधिक प्रभार दिए गए हैं और क्षेत्र के अनुपात में अमले की कमी है।
जवाब में यह आंकड़ा भी रखा गया कि निगम में कुल 6312 पद स्वीकृत हैं, जिनमें 1493 पद भरे हैं और 4819 रिक्त हैं। इसी जवाब में सफाई संरक्षकों के 3900 पद सभी खाली बताए गए। विवाद यहीं से बढ़ा, क्योंकि निगम की मौजूदा कार्य व्यवस्था इससे अलग स्थिति दिखाती है।
सफाई संरक्षक के आंकड़ों पर सबसे बड़ा अंतर
मामले का केंद्र सफाई संरक्षकों के पदों का डेटा रहा। उपलब्ध प्रशासनिक जानकारी के अनुसार निगम में 1200 से अधिक सफाई संरक्षक कार्यरत हैं। इसके अलावा 2400 से अधिक विनियमित सफाई संरक्षक भी सफाई व्यवस्था संभाल रहे हैं। ऐसे में विधानसभा में सभी 3900 पद खाली बताने पर सवाल खड़े हुए।
यही अंतर बाद में जांच और कार्रवाई का आधार बना। अधिकारी स्तर पर यह माना गया कि जो जानकारी भेजी गई, वह सत्यापन के बिना प्रेषित हुई। चूंकि सवाल विधानसभा से जुड़ा था, इसलिए इसे महत्वपूर्ण प्रकरण माना गया और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया तेज की गई।
26 फरवरी के खुलासे के बाद बढ़ा मामला
इस पूरे विवाद को 26 फरवरी को प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट के बाद व्यापक ध्यान मिला। रिपोर्ट में विधानसभा में दिए गए उत्तर और निगम की वास्तविक कार्यस्थिति के बीच अंतर का मुद्दा उठाया गया था। इसके बाद नगर निगम प्रशासन ने फाइलों की जांच की और जवाब तैयार करने की प्रक्रिया में शामिल कर्मचारियों पर कार्रवाई की दिशा तय की।
प्रशासनिक स्तर पर अब दो समानांतर प्रक्रियाएं चलेंगी। पहली, निलंबित अधीक्षक हरीश श्रीवास्तव के खिलाफ विभागीय जांच। दूसरी, सेवा समाप्त किए गए लिपिक अतुल वाजपेयी से संबंधित सेवा अभिलेख और भुगतान रोक के अनुपालन की प्रक्रिया।
यह मामला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि विधानसभा में दी गई जानकारी सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बनती है। ऐसे में स्थानीय निकाय से राज्य स्तर तक भेजे जाने वाले आंकड़ों की शुद्धता पर अब अधिक निगरानी की जरूरत सामने आई है। इंदौर निगम प्रकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि डेटा संकलन, सत्यापन और प्रेषण की श्रृंखला में किसी एक स्तर की चूक सीधे उच्चस्तरीय जवाबदेही का मुद्दा बन सकती है।