इंदौर: मेदांता प्रमुख डॉ. नरेश त्रेहान को बड़ी राहत, गैर-इरादतन हत्या के मामले में कोर्ट ने निरस्त किया FIR का आदेश

Indore News: विश्वप्रसिद्ध कार्डियक सर्जन और मेदांता सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल समूह के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) डॉ. नरेश त्रेहान को इंदौर की जिला अदालत से बड़ी कानूनी राहत मिली है। अदालत ने उनके खिलाफ ‘गैर-इरादतन हत्या’ (IPC धारा 304) के तहत मामला दर्ज करने के पिछले आदेश को रद्द कर दिया है। यह मामला इंदौर के मेदांता अस्पताल में एक महिला की उपचार के दौरान हुई मौत और उसमें कथित चिकित्सकीय लापरवाही से जुड़ा है।
क्या था पूरा मामला?
घटना 23 जून 2022 की है, जब इंदौर निवासी गिरीश मंगवानी की पत्नी एकता मंगवानी को तबीयत बिगड़ने पर मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उसी शाम आईसीयू (ICU) में उपचार के दौरान उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। पति गिरीश मंगवानी ने आरोप लगाया कि अस्पताल के डॉक्टरों—डॉ. पीयूष कानपुरी, डॉ. ज्योत वाधवानी और डॉ. निवेदिता बाली—ने इलाज में घोर लापरवाही बरती, जिसके कारण उनकी पत्नी की जान गई।
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सीएमएचओ (CMHO) और एमजीएम मेडिकल कॉलेज की संयुक्त जांच समितियों ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। अगस्त 2023 की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से पाया गया कि मरीज के उपचार में अनावश्यक देरी हुई और प्रबंधन की ओर से भी चूक हुई।

 

निचली अदालत का कड़ा रुख: डॉ. त्रेहान पर केस का आदेश
पुलिस द्वारा कार्रवाई न किए जाने पर पीड़ित पक्ष ने जिला कोर्ट में परिवाद दायर किया। न्यायिक मजिस्ट्रेट निर्मला वास्कले ने 1 दिसंबर 2025 को एक ऐतिहासिक आदेश देते हुए डॉ. नरेश त्रेहान और संबंधित डॉक्टरों के खिलाफ धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या) और धारा 34 के तहत एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए थे।
आदेश का मुख्य आधार यह था कि डॉ. पीयूष कानपुरी (जो कि एक बीएचएमएस यानी होम्योपैथी डॉक्टर थे) की नियुक्ति स्वयं डॉ. त्रेहान के हस्ताक्षरों से हुई थी। पीड़ित पक्ष के वकील चंचल गुप्ता का तर्क था कि एक विशेषज्ञ अस्पताल में हृदय संबंधी लक्षणों को न समझ पाने वाले डॉक्टर की नियुक्ति और उन्हें उचित ट्रेनिंग न देना सीधे तौर पर एमडी की जिम्मेदारी बनती है।

पुनरीक्षण याचिका और डॉ. त्रेहान के तर्क
इस आदेश के खिलाफ डॉ. त्रेहान ने वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा और मनु माहेश्वरी के माध्यम से पुनरीक्षण याचिका दाखिल की। कोर्ट में डॉ. त्रेहान की ओर से निम्नलिखित दलीलें पेश की गईं:
  1. सीमित भूमिका: डॉ. त्रेहान एक ग्लोबल कंपनी के एमडी हैं जो देशभर में अस्पताल चलाती है। वे अस्पताल के दैनिक कार्यों या व्यक्तिगत मरीजों के इलाज में सीधे तौर पर शामिल नहीं होते।
  2. अनुपस्थिति: घटना के समय वे देश में मौजूद नहीं थे और किसी भी शुरुआती जांच रिपोर्ट में उनका नाम व्यक्तिगत रूप से नहीं आया था।
  3. प्रतिष्ठा का हवाला: डॉ. त्रेहान पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित हैं और 48 हजार से ज्यादा सफल सर्जरी कर चुके हैं। उन पर लगाया गया आरोप उन्हें प्रताड़ित करने का प्रयास है।
अपर सत्र न्यायालय का नया फैसला
तमाम दलीलों को सुनने के बाद 13वें अपर सत्र न्यायाधीश अयाज मोहम्मद ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
  • आपराधिक नहीं, सिविल मामला: अदालत ने माना कि यह मामला ‘सिविल’ श्रेणी का हो सकता है, लेकिन इसे ‘आपराधिक’ नहीं माना जा सकता। इसके लिए पुलिस जांच की आवश्यकता नहीं है।
  • चिकित्सा जगत की छवि: कोर्ट ने कहा कि ऐसी धाराओं में मामला दर्ज करना, जिनमें आजीवन कारावास का प्रावधान है, तर्कसंगत नहीं है। इससे देश की चिकित्सा ख्याति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  • वैधता का अभाव: न्यायाधीश ने पिछले आदेश को अवैध करार देते हुए डॉ. त्रेहान को इस प्रकरण से मुक्त कर दिया।
निष्कर्ष: चिकित्सा और कानून के बीच की बहस
यह मामला मेडिकल नेग्लिगेंस (चिकित्सकीय लापरवाही) और प्रबंधन की जवाबदेही के बीच एक बड़ी बहस को जन्म देता है। जहां एक ओर पीड़ित परिवार का आरोप है कि विशेषज्ञ अस्पताल में गलत नियुक्तियों के कारण जान गई, वहीं दूसरी ओर कानून ने प्रबंधन के शीर्ष नेतृत्व को दैनिक चिकित्सकीय त्रुटियों से सुरक्षा प्रदान की है। फिलहाल, डॉ. त्रेहान को मिली इस राहत ने चिकित्सा जगत में एक बड़ी चर्चा छेड़ दी है।