इंदौर। शहर में दूषित पानी की समस्या को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच नगर निगम की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। हाल ही में शहर के विभिन्न इलाकों से पानी के नमूने लिए गए थे। नगर निगम ने दावा किया है कि ये सभी नमूने जांच में सुरक्षित पाए गए हैं। हालांकि, चौंकाने वाली बात यह है कि इन जांचों में पानी में मौजूद भारी धातुओं (हैवी मेटल्स) का परीक्षण ही नहीं किया गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, केवल क्लोरीन की मात्रा और पीएच स्तर की जांच करके पानी को पूरी तरह पीने योग्य घोषित करना जल्दबाजी हो सकती है। निगम ने जिन 1400 नमूनों की जांच का हवाला दिया है, उनमें से किसी में भी आर्सेनिक, लेड या मरकरी जैसे खतरनाक तत्वों की जांच शामिल नहीं थी।
जांच प्रक्रिया पर सवाल
नगर निगम के अधिकारियों ने बताया कि पिछले दिनों शहर के अलग-अलग जोन से करीब 1400 पानी के सैंपल कलेक्ट किए गए थे। इनकी जांच निगम की अपनी प्रयोगशाला में की गई। रिपोर्ट में दावा किया गया कि पानी पीने योग्य है और इसमें कोई खराबी नहीं है।
लेकिन तकनीकी जानकारों का कहना है कि निगम की लैब में अत्याधुनिक उपकरणों की कमी है। वहां मुख्य रूप से पानी का गंदलापन (टर्बिडिटी), पीएच मान और रेजिडुअल क्लोरीन की ही जांच हो पाती है। जबकि औद्योगिक क्षेत्रों और पुराने पाइपलाइनों वाले इलाकों में भारी धातुओं के मिश्रण का खतरा हमेशा बना रहता है।
“पानी में हैवी मेटल्स का पता लगाने के लिए स्पेक्ट्रोफोटोमीटर जैसे उपकरणों की आवश्यकता होती है, जो सामान्यत: निगम की लैब में उपलब्ध नहीं होते। बिना इस जांच के पानी को पूर्णत: सुरक्षित कहना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सही नहीं है।” — जल विशेषज्ञ
भोपाल में भी उठे थे ऐसे ही सवाल
गौरतलब है कि इससे पहले राजधानी भोपाल में भी जल प्रदूषण का मुद्दा गरमाया था। वहां भी कई कॉलोनियों में गंदा पानी आने की शिकायतें मिली थीं। तब भी प्रशासन ने शुरुआती जांच में सब कुछ सामान्य बताया था, लेकिन बाद में विस्तृत जांच की मांग उठी थी। इंदौर में भी अब वैसी ही स्थिति बनती दिख रही है, जहां जमीनी हकीकत और सरकारी दावों में अंतर नजर आ रहा है।
निगम का तर्क और आगे की राह
नगर निगम के जल कार्य विभाग का तर्क है कि वे नियमित रूप से पानी की गुणवत्ता की निगरानी करते हैं। अधिकारियों का कहना है कि नर्मदा का पानी ट्रीटमेंट प्लांट से होकर आता है, इसलिए उसमें भारी धातुओं की संभावना न के बराबर है। हालांकि, वितरण प्रणाली में लीकेज या सीवेज लाइन के मिल जाने से संक्रमण का खतरा बना रहता है।
फिलहाल, शहर के कई रहवासी संगठन और विपक्ष के नेता मांग कर रहे हैं कि पानी के नमूनों को किसी स्वतंत्र और उच्च स्तरीय प्रयोगशाला में भेजा जाए। ताकि, जनता के स्वास्थ्य के साथ हो रहे संभावित खिलवाड़ को रोका जा सके। मानसून के दौरान जल जनित बीमारियों का खतरा वैसे भी बढ़ जाता है, ऐसे में यह लापरवाही भारी पड़ सकती है।