इंदौर पुलिस की लापरवाही पर हाईकोर्ट सख्त: 12 जनवरी को कमिश्नर तलब, SC में दिए हलफनामे की अवहेलना पर नाराजगी

Indore News : इंदौर पुलिस की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। आजादनगर थाना क्षेत्र में हुई एक युवती की आत्महत्या के मामले में पुलिस की घोर लापरवाही सामने आई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है और इंदौर पुलिस कमिश्नर संतोष सिंह को 12 जनवरी को अदालत में पेश होने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने न केवल जांच अधिकारी की भूमिका पर सवाल उठाए हैं, बल्कि यह भी टिप्पणी की है कि राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे का पुलिस पालन नहीं कर रही है। यह मामला पुलिस की जांच प्रक्रिया और वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी (सुपरविजन) की कमी को उजागर करता है।

क्या है पूरा मामला?

घटनाक्रम के मुताबिक, 29 वर्षीय एक युवती ने 13 अगस्त को आत्महत्या कर ली थी। युवती के परिजनों का आरोप था कि वह विदिशा निवासी विकास बघेल (पिता लाखन सिंह) के साथ पिछले दो-तीन साल से रिलेशनशिप में थी। जब शादी की बात आई, तो विकास ने युवती के परिवार को अपने माता-पिता से बात करने को कहा।

12 अगस्त को जब युवती के परिजन विकास के घर गए, तो उसके माता-पिता ने अपमानजनक बातें कीं। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि उनके बेटे के कई लड़कियों से संबंध हैं और शादी के लिए 50 लाख रुपये दहेज की मांग की। इसके बाद युवती ने विकास से संपर्क किया, लेकिन उसने भी अपने परिवार का ही पक्ष लिया। आहत होकर युवती ने अगले दिन आत्महत्या कर ली।

पुलिस की लापरवाही की इंतहा

युवती के परिजनों ने विकास और उसके माता-पिता के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का केस दर्ज करने की मांग की थी। उस समय आजादनगर थाने के टीआई तिलक करोले थे। आरोप है कि पुलिस ने शुरुआत में एफआईआर दर्ज करने में ही टालमटोली की।

हैरानी की बात यह रही कि पुलिस ने युवती का मोबाइल तो ले लिया, लेकिन उसे फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा। सबसे अहम सबूत, यानी आरोपी विकास का मोबाइल पुलिस ने जब्त ही नहीं किया। टीआई करोले के तबादले के बाद लोकेश सिंह भदौरिया नए टीआई बने। घटना के करीब दो महीने बाद 9 अक्टूबर को एफआईआर दर्ज की गई, लेकिन उसमें भी केवल विकास को आरोपी बनाया गया और उसके माता-पिता का नाम हटा दिया गया।

कोर्ट के दखल के बाद जागा प्रशासन

मोबाइल जब्त न होने पर युवती के परिजनों ने वकील संतोष यादव और विकास यादव के जरिए जिला कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट के आदेश के बाद ही पुलिस ने आरोपी का मोबाइल जब्त किया। इससे आरोपी को साक्ष्य नष्ट करने का पूरा समय मिल गया।

पुलिस ने एफआईआर वाले दिन ही आरोपी विकास को गिरफ्तार किया और बिना फॉरेंसिक रिपोर्ट के महज तीन दिन में चालान पेश कर दिया। जांच अधिकारी सब-इंस्पेक्टर अमोष वसुनिया ने जल्दबाजी में यह कार्रवाई पूरी की।

हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी

मामला हाईकोर्ट पहुंचा जब आरोपी विकास की जमानत याचिका पर सुनवाई हो रही थी। पीड़ित पक्ष के वकील मनीष यादव ने पुलिस की जांच में खामियों को उजागर किया। उन्होंने बताया कि दहेज की मांग करने वाले माता-पिता को आरोपी नहीं बनाया गया।

जस्टिस सुबोध अभ्यंकर ने जब जांच अधिकारी वसुनिया से सवाल किया, तो उन्होंने स्वीकार किया कि किसी वरिष्ठ अधिकारी ने जांच की निगरानी नहीं की। इस पर कोर्ट ने केस डायरी में कॉल डिटेल और अन्य तथ्यों के अभाव पर कड़ी नाराजगी जताई।

‘सुप्रीम कोर्ट की आंखों में धूल झोंकने जैसा’

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट लिखा कि अगस्त 2024 में ही गंभीर मामलों में वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा सुपरविजन के आदेश दिए गए थे। राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा भी दिया था। इसके बावजूद गंभीर मामलों में अधिकारियों की निगरानी न होना सुप्रीम कोर्ट की अवमानना है।

कोर्ट ने कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट की आंखों में धूल झोंकने जैसा है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया था कि आईपीएस अधिकारियों की कमी के कारण डीएसपी स्तर पर सुपरविजन कराया जा सकता है, लेकिन आजादनगर मामले में सब-इंस्पेक्टर ने स्वीकार किया कि कोई सुपरविजन अधिकारी नियुक्त ही नहीं था। इसी लापरवाही के चलते अब पुलिस कमिश्नर को जवाब देने के लिए तलब किया गया है।