इंदौर में ‘शिक्षा माफिया’ का खेल: नियमों को ठेंगा दिखा रहे 400 से ज्यादा स्कूल, प्राइवेट किताबों के नाम पर अभिभावकों से ऐंठ रहे पैसे

Indore News: मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही ‘शिक्षा माफिया’ एक बार फिर सक्रिय हो गया है। सरकारी आदेशों और ‘फीस रेगुलेशन एक्ट 2018’ को ताक पर रखकर निजी स्कूल प्रबंधन अभिभावकों की जेब पर डाका डाल रहे हैं। पूरे प्रदेश की अगर बात करें तो किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर लगभग 800 से 1000 करोड़ रुपये का काला कारोबार फल-फूल रहा है।
इंदौर के 80 स्कूलों में ‘सिंडिकेट’ राज
अकेले इंदौर शहर में करीब 70 से 80 ऐसे बड़े स्कूल हैं, जहाँ छात्रों की संख्या 2000 से 3000 के बीच है। खेल इतना शातिर है कि NCERT और मध्य प्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम की सस्ती किताबों के बजाय प्राइवेट पब्लिकेशन की महंगी किताबें अनिवार्य कर दी गई हैं। यदि एक कक्षा में 50 बच्चे हैं और उनमें सिर्फ दो अतिरिक्त प्राइवेट किताबें भी जोड़ दी जाएं, तो मुनाफे का यह गणित करोड़ों में पहुँच जाता है।
दबाव की रणनीति: ‘कहीं से भी लो’ पर मिलती ‘एक ही जगह’ है
जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग हर साल आदेश जारी करता है कि अभिभावकों को किसी विशेष दुकान से सामान खरीदने के लिए मजबूर न किया जाए। स्कूल प्रबंधन कागजों पर तो यह कहते हैं कि “आप कहीं से भी यूनिफॉर्म और किताबें ले सकते हैं”, लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि उन विशेष पब्लिकेशन की किताबें और खास डिजाइन की यूनिफॉर्म शहर की चुनिंदा दुकानों के अलावा कहीं मिलती ही नहीं है। मजबूरी में अभिभावकों को उन दुकानों पर लंबी कतारों में लगकर ऊँची कीमतों पर सामान खरीदना पड़ता है।
फीस एक्ट 2018 का खुला उल्लंघन
अभिभावकों की समस्याओं को देखते हुए राज्य सरकार ने 2018 में ‘फीस एक्ट’ बनाया था, ताकि निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम कसी जा सके। इसके बावजूद इंदौर के 400 से अधिक स्कूल सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। NCERT की किताबें जहाँ कुछ सौ रुपयों में मिल जाती हैं, वहीं प्राइवेट प्रकाशकों का सेट हजारों में बैठ रहा है।
अभिभावकों की मांग: परेशान माता-पिता का कहना है कि प्रशासन केवल नोटिस जारी करने की रस्म अदायगी करता है, जबकि धरातल पर स्कूल माफिया और प्रकाशकों का नेक्सस (गठजोड़) बदस्तूर जारी है। अप्रैल का महीना शुरू होते ही स्टेशनरी और ड्रेस की दुकानों पर मची यह लूट मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट बिगाड़ रही है। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इन रसूखदार स्कूलों पर कोई कड़ी दंडात्मक कार्रवाई करेगा या ‘शिक्षा माफिया’ का यह खेल ऐसे ही चलता रहेगा।