इंदौर की जनता पर दोहरी मार, सड़ी लाश के बाद अब नलों में शौचालय जैसा दूषित पानी, प्रशासन की लापरवाही उजागर

यह कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है कि कोई इंसान सड़ी लाश या शौचालय से निकला गंदा पानी पीने को मजबूर हो जाए, लेकिन इंदौर में यह सिर्फ कल्पना नहीं, कड़वी हकीकत बन चुका है। वर्षों पहले सुभाष चौक की पानी टंकी में सड़ी लाश मिलने के बावजूद उसी पानी की सप्लाई लोगों तक होती रही और अब भागीरथपुरा में तो हद ही पार हो गई। नर्मदा की मुख्य पाइपलाइन में पुलिस चौकी के शौचालय का पानी कई दिनों तक मिलकर घरों तक पहुंचता रहा। रहवासियों ने बार-बार नगर निगम को चेताया, शिकायतें कीं, गुहार लगाई, लेकिन सिस्टम ने आंखें मूंदे रखीं। नतीजा यह हुआ कि एक हजार से ज्यादा लोग बीमार पड़े और आठ परिवारों के घरों में मौत का मातम पसर गया। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे-सीधे अमानवीय अपराध है।

ट्रिपल इंजन सरकार और ज़मीनी हकीकत का कड़वा सच

बीते कई वर्षों से नगर निगम पर भाजपा का शासन है, जिसे ‘ट्रिपल इंजन सरकार’ कहकर खूब प्रचारित किया जाता है। मगर हकीकत यह है कि मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी कहलाने वाला इंदौर आज भी अपने नागरिकों को सुरक्षित पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा तक नहीं दे पा रहा। वही शहर, जिसे जनता ने आठ बार देश में स्वच्छता में नंबर वन बनाया, उसी शहर में लोग शौचालय का पानी पीने को मजबूर हैं। अवॉर्ड लेने के समय नेता और अफसर साफे बांधकर मंच पर मुस्कुराते नजर आते हैं, लेकिन जब जिम्मेदारी निभाने की बारी आती है तो आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हो जाता है। नगर निगम में महापौर से लेकर अधिकांश पार्षद भाजपा के हैं, जिले की सभी नौ विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है और प्रदेश से लेकर केंद्र तक उसी पार्टी की सरकार है—फिर भी जवाबदेही का कोई चेहरा सामने नहीं आता।

ताकतवर मंत्री का क्षेत्र और सवालों के घेरे में सिस्टम

सबसे गंभीर सवाल यह है कि यह हादसा उस क्षेत्र में हुआ है, जहां के विधायक स्वयं प्रदेश के ताकतवर काबीना मंत्री कैलाश विजयवर्गीय हैं, जो नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के मुखिया भी हैं। यानी इंदौर सहित पूरे प्रदेश के नगरीय निकाय सीधे उन्हीं के अधीन आते हैं। इसके बावजूद यदि राजधानी के सबसे चर्चित शहर में ऐसी भयावह घटना हो जाए, तो जिम्मेदारी किसकी बनती है? इंदौर की जनता की सहनशीलता सचमुच काबिल-ए-तारीफ है, जो टैक्स पर टैक्स भरने, रोजमर्रा की रिश्वतखोरी झेलने और ऐसी त्रासदियों के बाद भी सड़कों पर उतरकर बड़ा जन आंदोलन नहीं करती। दूसरी ओर विपक्ष की हालत भी ऐसी है कि वह गुटबाजी से ऊपर उठकर जनता की आवाज तक नहीं बन पा रहा।

मौतों के आंकड़े और सच छुपाने की कोशिशें

भागीरथपुरा में दूषित पानी की सप्लाई के बाद एक हफ्ते के भीतर आठ मौतों की बात स्थानीय लोग लगातार कह रहे हैं, जबकि सरकारी आंकड़ों में सिर्फ तीन मौतों की पुष्टि की जा रही है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार 70 वर्षीय नंदलाल, 60 वर्षीय उर्मिला और 65 वर्षीय तारा कोरी की मौत डायरिया से हुई। संभागायुक्त से लेकर कलेक्टर तक सभी जिम्मेदार अधिकारी इन्हीं तीन मौतों पर मुहर लगा रहे हैं। मगर क्षेत्र के लोग चीख-चीखकर मीडिया को बता रहे हैं कि मरने वालों की संख्या इससे कहीं अधिक है। यह कोई नई बात नहीं है—ऐसे हादसों के बाद सरकारी मशीनरी द्वारा आंकड़े दबाने और सच्चाई को नरम करने की कोशिशें अक्सर देखने को मिलती रही हैं।

संवेदनहीनता की तस्वीरें और जनता का गुस्सा

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा आक्रोश नेताओं और जनप्रतिनिधियों की संवेदनहीन छवियों को लेकर है। महापौर की सोशल मीडिया टीम सालभर एक्टिव रहती है—घटना पर ‘मन व्यथित’ होने की पोस्ट भी आई, लेकिन उसी दौरान चाय-बिस्किट, दावतों और सफाईकर्मियों के साथ पोहा पार्टी की तस्वीरों पर जनता ने तीखे व्यंग्य कसे। क्षेत्रीय पार्षद कमल वाघेला की झूला झूलते तस्वीरें वायरल हुईं और अब वे अफसरों पर टेंडर समय पर जारी न करने का आरोप लगा रहे हैं। जल समिति प्रभारी और अन्य जिम्मेदार लोग भी मिलन समारोहों और दावतों में व्यस्त नजर आए। सवाल सीधा है—जब शहर के लोग अस्पतालों में तड़प रहे थे और घरों में मौत का सन्नाटा था, तब शहर के कर्णधार किस दुनिया में थे? इंदौर आज सिर्फ दूषित पानी की नहीं, बल्कि एक संवेदनहीन और गैर-जवाबदेह व्यवस्था की त्रासदी झेल रहा है।