इंदौर का सराफा बाजार, जो दिन में सोने-चांदी के कारोबार और रात में स्वादिष्ट स्ट्रीट फूड के लिए मशहूर है, पिछले कुछ दिनों से सुर्खियों में है। पारंपरिक व्यंजनों की पहचान वाले इस ऐतिहासिक स्थल पर हाल ही में जारी दुकानों की सूची ने दुकानदारों और नगर निगम के बीच खींचतान को जन्म दे दिया है। दुकानदारों का आरोप है कि वर्षों से व्यवसाय कर रहे स्थानीय लोगों को सूची से बाहर किया गया, जबकि नए और कुछ वर्ष पुराने व्यापारियों को शामिल कर लिया गया।
पारंपरिक बनाम आधुनिक व्यंजन
इंदौर नगर निगम द्वारा जारी 69 दुकानों की सूची ने विवाद को हवा दी है। यह सूची सराफा चाट-चौपाटी एसोसिएशन और सराफा व्यापारी एसोसिएशन के सहयोग से तैयार की गई थी। लेकिन कई दुकानदारों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि पारंपरिक और वर्षों से संचालित दुकानों को नजरअंदाज किया गया और चाइनीज, मेमोज जैसी आधुनिक व्यंजन वाली दुकानें सूची में शामिल कर दी गईं। उनका कहना है कि सराफा चौपाटी की असली पहचान सिर्फ इंदौरी व्यंजन हैं, न कि बाहरी और आधुनिक फूड आइटम।
महापौर का स्पष्ट संदेश
हटाए गए दुकानदारों की शिकायतों के बाद महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने कहा कि सराफा चौपाटी में केवल पारंपरिक व्यंजन बेचने वालों को ही स्थान मिलेगा। मेमोज और चाइनीज फूड वाली दुकानों को सूची से बाहर किया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि अगर कोई पुराना दुकानदार सूची से बाहर रह गया है, तो आवेदन देकर उसे शामिल कराया जा सकता है। इसके साथ ही 69 दुकानों की संख्या में भी बदलाव संभव है।
दुकानदारों की नाराज़गी
हटाए गए दुकानदारों का कहना है कि कई लोग 20-25 वर्षों से सराफा चौपाटी में पारंपरिक व्यंजन बेच रहे हैं। उनकी दुकानों को बिना किसी स्पष्ट कारण सूची से बाहर किया जाना उनके परिवारों की रोज़ी-रोटी पर सीधा असर डालता है। इसके अलावा, निगम ने उन्हें कोई वैकल्पिक स्थान भी उपलब्ध नहीं कराया, जिससे उनका भविष्य असुरक्षित हो गया है।
राजनीतिक रंग पकड़ता विवाद
सराफा चौपाटी विवाद अब राजनीतिक सवाल भी बन गया है। कांग्रेस नेता चिंटू चौकसे ने आरोप लगाया कि नगर निगम ने ऐतिहासिक स्थल की पहचान का मजाक बना दिया और अनुमति प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं रखी गई। उनका कहना है कि कुछ दुकानदारों के नाम भाजपा नेताओं के रिश्तेदारों द्वारा सूची में जोड़े गए हैं।
सराफा की फूड संस्कृति पर असर
सराफा बाजार सिर्फ इंदौर नहीं, बल्कि पूरे देश में मिडनाइट फूड कल्चर का प्रतीक है। यहाँ के पोहा, दही बड़ा, गराड़ू, भुट्टे का किस और मालपुआ जैसे व्यंजन स्थानीय पहचान हैं। पारंपरिक दुकानों को प्राथमिकता देने से यह सांस्कृतिक संरक्षण संभव होगा, लेकिन 100 से अधिक दुकानदारों की रोज़ी-रोटी पर संकट भी मंडरा रहा है। केवल 69 दुकानदारों को अनुमति देने से भीड़ प्रबंधन और व्यापारिक टकराव की समस्याएँ भी बढ़ सकती हैं।