मध्यप्रदेश में मंत्रालय कर्मचारियों का आंदोलन तय, लंबित मांगों पर आपात बैठक में बड़ा फैसला

मध्यप्रदेश के मंत्रालय में कार्यरत अधिकारी-कर्मचारियों की कई न्यायोचित मांगें और समस्याएं लंबे समय से लंबित पड़ी हुई हैं। इन मांगों को लेकर कर्मचारी संगठन कई बार शासन और वरिष्ठ अधिकारियों को ज्ञापन सौंप चुका है तथा विभिन्न स्तरों पर बैठकों के माध्यम से समाधान की कोशिश भी की गई। बावजूद इसके, अब तक इन मुद्दों पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया है। इसी स्थिति को देखते हुए मंत्रालय सेवा अधिकारी-कर्मचारी संघ की कार्यकारिणी समिति की आपात बैठक बुलाई गई, जिसमें यह तय किया गया कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो मंत्रालय स्तर पर आंदोलन शुरू किया जाएगा। संगठन का कहना है कि कर्मचारियों की उपेक्षा के कारण असंतोष बढ़ रहा है और अब आंदोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

संघ ने विशेष रूप से चौथे समयमान वेतनमान के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है। संगठन का कहना है कि प्रदेश के अधिकांश विभागों में कर्मचारियों को चौथा समयमान वेतनमान प्रदान किया जा चुका है, लेकिन मंत्रालय में कार्यरत अधिकारी और कर्मचारी अब भी इससे वंचित हैं। सामान्य प्रशासन विभाग ने 9 मार्च 2020 को सभी विभागों को निर्देश जारी किए थे कि राज्य प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर समयमान वेतनमान के साथ उच्च पदनाम देकर पदोन्नति का रास्ता निकाला जाए। इन निर्देशों के बाद कोष एवं लेखा विभाग, स्कूल शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग, जनजातीय कार्य विभाग सहित कई विभागों ने आवश्यक कार्रवाई पूरी कर ली, लेकिन विडंबना यह है कि स्वयं सामान्य प्रशासन विभाग ने ही अपने आदेशों का पालन अब तक नहीं किया है।

मंत्रालय सेवा अधिकारी-कर्मचारी संघ के अध्यक्ष इंजीनियर सुधीर नायक ने बताया कि कर्मचारियों की अन्य कई महत्वपूर्ण समस्याएं भी वर्षों से अनसुलझी हैं। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों के लिए कैशलेस स्वास्थ्य बीमा योजना लागू करने की मांग लंबे समय से की जा रही है। इस संबंध में कई बैठकें भी हो चुकी हैं, लेकिन अब तक योजना को लागू नहीं किया गया है, जबकि इस योजना से सरकार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ता। इसके अलावा स्थायी कर्मचारियों को अभी तक सातवां वेतनमान भी नहीं दिया गया है, जिससे उनमें नाराजगी बढ़ रही है।

आउटसोर्स कर्मचारियों की स्थिति को लेकर भी संघ ने गंभीर चिंता जताई है। संगठन के अनुसार इन कर्मचारियों से निर्धारित समय से अधिक काम लिया जा रहा है, लेकिन उन्हें काम के घंटे, अवकाश और पद के अनुरूप न्यूनतम वेतन जैसी मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मिल रही हैं। वहीं मंत्री स्थापना और मंत्रालय स्थापना में कार्यरत आकस्मिकता निधि कर्मचारियों को नियमित करने के लिए आयोजित परीक्षा का परिणाम भी तीन साल बाद तक घोषित नहीं किया गया है। इतना ही नहीं, इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए दूसरी परीक्षा भी आयोजित नहीं की गई, जिससे प्रभावित कर्मचारियों में असंतोष और बढ़ गया है।

संघ ने यह भी मांग उठाई है कि केंद्र सरकार की तर्ज पर फुल पेंशनेविल सर्विस की अवधि 25 वर्ष की जाए, ताकि कर्मचारियों को समय पर पेंशन का लाभ मिल सके। इन सभी मुद्दों को मिलाकर संगठन ने कुल 19 सूत्रीय मांगों का प्रस्ताव तैयार किया है, जिन्हें लेकर मंत्रालय स्तर पर आंदोलन की रणनीति बनाई जा रही है। संगठन का कहना है कि यदि सरकार जल्द इन मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लेती है, तो कर्मचारी बड़े स्तर पर आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे।

आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए मंत्रालय सेवा अधिकारी-कर्मचारी संघ अन्य संगठनों से भी संपर्क कर रहा है। संघ के पदाधिकारियों ने मंत्रालय के शीघ्र लेखकों और अजाक्स संगठन से भी आंदोलन में शामिल होने की अपील की है। इसके अलावा विधानसभा, विधि विभाग और राजभवन में कार्यरत कर्मचारियों से भी समर्थन मांगा जा रहा है, क्योंकि इन विभागों के कर्मचारियों को भी चौथे समयमान वेतनमान का लाभ अब तक नहीं मिल पाया है। संगठन का मानना है कि यदि सभी कर्मचारी संगठन एकजुट होकर आवाज उठाते हैं, तो सरकार पर जल्द निर्णय लेने का दबाव बनेगा।