मध्य प्रदेश की अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या में इजाफा नहीं किया गया तो लंबित मामलों का निपटारा करने में चार दशक तक का समय लग सकता है। राज्य की न्यायिक व्यवस्था में न्यायाधीशों की भारी कमी के चलते न्याय प्रक्रिया गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है।
भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम में न्यायिक अधिकारियों ने इस गंभीर स्थिति पर चिंता जताई। मौजूदा हालात में न्यायाधीशों की संख्या और लंबित मामलों की संख्या के बीच भारी असंतुलन देखने को मिल रहा है।
लंबित मामलों की विकट स्थिति
मध्य प्रदेश की अदालतों में लाखों मामले लंबित हैं। वर्तमान दर से मामलों का निपटारा जारी रहा तो यह बैकलॉग साफ होने में कई दशक लग जाएंगे। न्यायिक अधिकारियों का मानना है कि यह स्थिति न्याय व्यवस्था के लिए चुनौतीपूर्ण है।
राज्य में न्यायिक पदों पर रिक्तियां लंबे समय से भरी नहीं जा रही हैं। इससे मौजूदा न्यायाधीशों पर कार्यभार बढ़ता जा रहा है और मामलों का निपटारा धीमी गति से हो रहा है।
न्यायाधीशों की कमी का असर
न्यायिक अधिकारियों ने बताया कि न्यायाधीशों की कमी से न केवल मामलों का निपटारा प्रभावित हो रहा है बल्कि न्याय की गुणवत्ता पर भी असर पड़ रहा है। मुकदमेबाजों को वर्षों तक न्याय के लिए इंतजार करना पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाए बिना लंबित मामलों को निपटाना लगभग असंभव है। राज्य सरकार को इस दिशा में तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।
समाधान की दिशा
न्यायिक अधिकारियों ने सुझाव दिया है कि न्यायाधीशों की भर्ती प्रक्रिया तेज की जाए। साथ ही रिक्त पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरा जाना चाहिए।
अदालतों में बुनियादी ढांचे का विकास और डिजिटलीकरण भी जरूरी है। इससे मामलों की सुनवाई में तेजी लाई जा सकती है और न्याय प्रक्रिया को सुगम बनाया जा सकता है।
राज्य सरकार से अपेक्षा है कि वह न्यायपालिका को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाए। न्यायाधीशों की नियुक्ति में तेजी लाकर ही न्याय व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सकता है।