जनवरी 2026 में वाराणसी के ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट पर चल रहे सौंदर्यीकरण कार्य को लेकर विवाद गहराता नजर आया, जब गीतकार और लेखक स्वानंद किरकिरे ने खुलकर सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि विकास के नाम पर जिस तरह से घाट क्षेत्र में बुलडोजर चलाए जा रहे हैं, उससे न सिर्फ प्राचीन धार्मिक संरचनाओं को नुकसान पहुंचा है, बल्कि वहां वर्षों से जीवनयापन कर रहे लोगों की आस्था और रोजी-रोटी पर भी सीधा असर पड़ा है। इस मुद्दे ने स्थानीय लोगों की भावनाओं को झकझोर दिया है।
सौंदर्यीकरण के नाम पर टूटती परंपराएं
मणिकर्णिका घाट के सौंदर्यीकरण प्रोजेक्ट के तहत कई पुराने और छोटे मंदिरों को हटाए जाने की खबरें सामने आईं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बिना पर्याप्त संवाद और विकल्प दिए बुलडोजर चलाए गए, जिससे मूर्तियां खंडित हुईं और धार्मिक स्थल नष्ट हो गए। घाट से जुड़े पुजारी, पंडे और अन्य कर्मकांड करने वाले लोग इस बात से भयभीत हैं कि उनके रोजगार का आधार ही खत्म होता जा रहा है। यही चिंता स्वानंद किरकिरे की आवाज में भी साफ झलकी।
स्वानंद किरकिरे का स्पष्ट संदेश
स्वानंद किरकिरे ने कहा कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास ऐसा हो जो लोगों की आस्था और परंपराओं का सम्मान करे। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर किसी योजना से लोगों को उजाड़ा जा रहा है, तो उनके पुनर्वास, भोजन और जीवनयापन की व्यवस्था क्यों नहीं की गई। उनका कहना था कि मणिकर्णिका घाट केवल एक स्थान नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं का केंद्र है, जिसे मशीनों से कुचलना समाधान नहीं हो सकता।
स्थानीय लोगों में गुस्सा और पीड़ा
घाट से जुड़े स्थानीय लोगों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर गहरा आक्रोश है। उनका कहना है कि पीढ़ियों से वे यहां सेवा, पूजा और अंतिम संस्कार से जुड़े कार्य करते आए हैं। अचानक आए बदलावों ने उनके भविष्य को अनिश्चित बना दिया है। कई लोगों को लगता है कि विकास की परिभाषा सिर्फ चमक-दमक तक सीमित कर दी गई है, जबकि जमीन से जुड़े लोगों की पीड़ा को नजरअंदाज किया जा रहा है। दूसरी ओर प्रशासन का तर्क है कि यह काम शहर के व्यापक विकास और सुविधा विस्तार के लिए जरूरी है।
मणिकर्णिका घाट का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
मणिकर्णिका घाट वाराणसी का सबसे पवित्र और प्राचीन श्मशान घाट माना जाता है। मान्यता है कि यहां अंतिम संस्कार करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह घाट केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां मौजूद छोटे-बड़े मंदिर, प्रतीक और परंपराएं सदियों की विरासत को संजोए हुए हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार का बदलाव बेहद संवेदनशील तरीके से किए जाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
विकास बनाम आस्था की बहस
पूरा मामला अब विकास और आस्था के टकराव का प्रतीक बन चुका है। स्वानंद किरकिरे जैसे लोगों का कहना है कि सरकार को विकास योजनाएं बनाते समय मानवीय पहलू और धार्मिक भावनाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए। यह विरोध केवल इमारतों को बचाने का नहीं, बल्कि उन लोगों की आवाज है जिनकी पहचान, आस्था और जीवन मणिकर्णिका घाट से जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि यह मुद्दा अब स्थानीय नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक बहस का रूप ले चुका है।