Jodhpur News: प्रसिद्ध भजन गायिका और आध्यात्मिक कथावाचक साध्वी प्रेम बाईसा का मात्र 25 वर्ष की आयु में आकस्मिक निधन हो गया है। उनके निधन की खबर फैलते ही राजस्थान सहित देशभर में उनके अनुयायियों के बीच शोक की लहर दौड़ गई। साध्वी प्रेम बाईसा को उनके पैतृक गांव परेऊ (बाड़मेर) स्थित ‘शिव शक्ति धाम’ आश्रम में पूरे विधि-विधान के साथ समाधि दी गई।
मृत्यु का घटनाक्रम और बढ़ता विवाद
प्राप्त जानकारी के अनुसार, मंगलवार 27 जनवरी को साध्वी अजमेर में एक कथा संपन्न कर जोधपुर स्थित अपने आश्रम लौटी थीं। बुधवार सुबह उन्हें सांस लेने में तकलीफ महसूस हुई। सूत्रो के मुताबिक बताया जा रहा है कि शुरुआत में एक स्थानीय कंपाउंडर ने उन्हें इंजेक्शन लगाया, लेकिन उनकी स्थिति में सुधार होने के बजाय गिरावट आती गई। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
हालाकि, उनकी मृत्यु की गुत्थी अभी पूरी तरह सुलझी नहीं है। पुलिस इसे संदिग्ध मानकर जांच कर रही है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह प्राकृतिक मृत्यु थी, आत्महत्या या कोई गहरी साजिश।
दाह संस्कार के बजाय क्यों दी गई ‘भू-समाधि’?
हिंदू धर्म में सामान्यतः शव के दाह संस्कार (अग्नि संस्कार) की परंपरा है, लेकिन साध्वी प्रेम बाईसा के मामले में उन्हें भू-समाधि दी गई। इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक और धार्मिक कारण हैं:
मोह-माया से मुक्ति: शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति संन्यास धारण कर लेता है, वह जीवित रहते ही अपने पुराने सांसारिक अस्तित्व का ‘पिंडदान’ कर देता है। संन्यासियों का शरीर पंचमहाभूतों की सीमाओं से परे माना जाता है, इसलिए उन्हें जलाया नहीं जाता।
तपस्या का सम्मान: साधु-संतों के शरीर को पवित्र माना जाता है। समाधि को उनकी साधना और आध्यात्मिक स्तर के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है।
मोक्ष की अवधारणा: मान्यता है कि समाधि के माध्यम से आत्मा को शीघ्र मोक्ष की प्राप्ति होती है। जिस तरह भगवान राम ने जल समाधि ली थी, उसी परंपरा का निर्वहन करते हुए संतों को समाधि दी जाती है ताकि उनका अस्तित्व एक पवित्र स्मारक के रूप में बना रहे।
12 वर्ष की आयु में ही चुन ली थी धर्म की राह
साध्वी प्रेम बाईसा का जीवन परिचय प्रेरणादायक रहा है। महज 12 साल की छोटी उम्र में उन्होंने सांसारिक सुखों का त्याग कर अध्यात्म का मार्ग चुन लिया था। अपनी सुरीली आवाज और प्रभावशाली कथा शैली के कारण वे अल्पायु में ही बहुत लोकप्रिय हो गई थीं। उनके अंतिम दर्शन के लिए परेऊ गांव में हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी, जो उनकी लोकप्रियता का जीवंत प्रमाण है।