मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जजों की कमी का संकट गहराता जा रहा है। न्यायपालिका पर बढ़ते मुकदमों के बोझ के बीच जजों के खाली पद चिंता का विषय बने हुए हैं। फिलहाल हाईकोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या के मुकाबले आधे से भी कम जज कार्यरत हैं। आने वाले समय में यह स्थिति और भी गंभीर होने वाली है, क्योंकि अगले कुछ महीनों में कई वरिष्ठ जज सेवानिवृत्त होने वाले हैं।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जजों के कुल 53 पद स्वीकृत हैं। वर्तमान में यहां केवल 29 जज ही सेवाएं दे रहे हैं। इसका सीधा असर मुकदमों की सुनवाई और उनके निपटारे पर पड़ रहा है। स्थिति यह है कि हाईकोर्ट में लंबित मामलों का आंकड़ा 4 लाख 57 हजार को पार कर गया है।
7 जज होने वाले हैं रिटायर
जजों की मौजूदा संख्या पहले ही कम है, लेकिन आने वाले दिनों में यह संकट और बढ़ सकता है। अगले कुछ महीनों के भीतर हाईकोर्ट के 7 जज सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इन रिटायरमेंट्स के बाद जजों की संख्या घटकर महज 22 रह जाएगी। इतनी कम संख्या में जजों के लिए लाखों पेंडिंग केसों की सुनवाई करना एक बड़ी चुनौती होगी।
लगातार बढ़ रहा पेंडेंसी का ग्राफ
हाईकोर्ट में जजों की कमी का सीधा असर पेंडेंसी पर दिख रहा है। वर्तमान में 4 लाख 57 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं। इनमें से 1 लाख 70 हजार मामले ऐसे हैं जो पिछले 5 से 10 सालों से कोर्ट में चल रहे हैं। वहीं, 60 हजार से अधिक मामले ऐसे हैं जो 10 से 20 साल पुराने हैं। सबसे चिंताजनक आंकड़ा उन मामलों का है जो 20 साल से भी ज्यादा समय से न्याय की बाट जोह रहे हैं; ऐसे मामलों की संख्या 16 हजार से अधिक है।
नई नियुक्तियों का इंतजार
जजों की घटती संख्या को देखते हुए कॉलेजियम ने नए नामों की सिफारिश की थी, लेकिन अभी तक नियुक्तियां नहीं हो पाई हैं। जानकारी के अनुसार, हाईकोर्ट कॉलेजियम ने 12 वकीलों को जज बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को प्रस्ताव भेजा था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन नामों को वापस लौटा दिया है। इसके अलावा, जिला अदालतों के जजों को हाईकोर्ट में प्रमोट करने का मामला भी फिलहाल अधर में लटका हुआ है।
न्याय मिलने में हो रही देरी
कानूनी जानकारों का मानना है कि जजों की कमी के कारण ‘तारीख पर तारीख’ का सिलसिला बढ़ गया है। एक जज पर मुकदमों का बोझ इतना अधिक है कि वे हर मामले को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे हैं। यदि जल्द ही जजों की नियुक्ति नहीं की गई, तो पेंडिंग केसों का यह पहाड़ और ऊंचा होता जाएगा, जिससे आम आदमी को समय पर न्याय मिलना मुश्किल हो सकता है।