नई दिल्ली/जबलपुर: मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के 27% आरक्षण से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव आ गया है। सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 21 जनवरी 2026 को आरक्षण संबंधी समस्त प्रकरणों को अंतिम सुनवाई (Final Hearing) के लिए सूचीबद्ध किया गया है। यह सुनवाई जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ में होगी।
लंबे समय से चल रहे इस कानूनी विवाद में मध्य प्रदेश सरकार की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि सरकार की ओर से प्रकरणों में अंतिम बहस करने के बजाय बार-बार समय लिया जा रहा है, जिससे मामले के निराकरण में देरी हो रही है।
सरकार के ही कानून पर संवैधानिक पेच
दिलचस्प बात यह है कि मध्य प्रदेश सरकार ने अपने ही कानून की संवैधानिकता जांचने के लिए हाईकोर्ट से इन मामलों को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करवाया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि राज्य के किसी भी कानून की संवैधानिकता का परीक्षण करने का प्राथमिक अधिकार अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के पास है।
हाल ही में शीर्ष अदालत ने 20 अभ्यर्थियों की याचिकाओं का निराकरण करते हुए उन्हें हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता दी है। इस कदम से यह संभावना जताई जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन सभी मामले वापस हाईकोर्ट को प्रत्यावर्तित (Remand back) किए जा सकते हैं। पिछली दो सुनवाइयों में कोर्ट ने सभी अंतरिम आदेशों को निरस्त कर मामलों को हाईकोर्ट भेजने की मंशा जाहिर की थी, लेकिन राज्य सरकार की ओर से इस पर सहमति नहीं दी गई।
स्टे नहीं, फिर भी रुका हुआ है आरक्षण
कानूनी जानकारों के मुताबिक, मध्य प्रदेश विधानसभा से 14 अगस्त 2019 को ओबीसी के लिए 27% आरक्षण का कानून पारित हुआ था। आज तक न तो हाईकोर्ट ने और न ही सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून पर कोई ‘स्टे’ (रोक) लगाया है। इसके बावजूद राज्य सरकार इसे पूर्ण रूप से लागू नहीं कर रही है।
विभागों द्वारा निकाली जा रही भर्तियों के विज्ञापन में तो 27% आरक्षण का उल्लेख होता है, लेकिन नियुक्तियां केवल 14% पदों पर दी जा रही हैं। महाधिवक्ता के अभिमत के आधार पर 113% पर रिजल्ट जारी कर 87% पदों पर नियुक्तियां दी जा रही हैं, जबकि 13% ओबीसी और 13% सामान्य वर्ग के पदों को ‘होल्ड’ पर रखा जा रहा है।
अंतरिम आदेशों का हवाला और सरकार का स्पष्टीकरण
सरकार पर आरोप है कि वह खारिज हो चुकी याचिकाओं के अंतरिम आदेशों का हवाला देकर नियुक्तियां रोक रही है। उदाहरण के तौर पर:
सरकार ने आरटीआई में बताया कि हाईकोर्ट ने याचिका क्र. 18105/21 में 4 अगस्त 2023 को अंतरिम आदेश दिया था, इसलिए 27% आरक्षण लागू नहीं होगा। जबकि यह याचिका 28 जनवरी 2025 को खारिज हो चुकी है और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसकी पुष्टि कर दी है।
दबाव बढ़ने पर सरकार ने एक अन्य याचिका (क्र. 3668/22) के 4 मई 2022 के आदेश का हवाला दिया। जब यह स्पष्ट किया गया कि इसमें भी कानून पर स्टे नहीं है, तो सरकार ने मामला विचाराधीन होने का तर्क दिया।
विशेषज्ञ की राय
ओबीसी पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं।
“सरकार को ओबीसी का 27% आरक्षण लागू करने और होल्ड पदों को अनहोल्ड करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। सरकार चाहे तो विचाराधीन याचिकाओं के अंतिम निर्णय के अधीन रहते हुए आरक्षण लागू कर सकती है और होल्ड पदों पर कार्यवाही आगे बढ़ा सकती है।” — रामेश्वर सिंह ठाकुर, वरिष्ठ अधिवक्ता
फिलहाल, होल्ड किए गए अभ्यर्थियों को न तो उनके प्राप्तांक बताए जा रहे हैं और न ही अंतिम परिणाम जारी किया जा रहा है। अब सभी की निगाहें 21 जनवरी 2026 को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सरकार को अपना पक्ष मजबूती से रखना होगा।