मध्यप्रदेश में 4 लाख 13 हजार से अधिक फैमिली पेंशन के पात्रों को हर महीने महंगाई राहत (डीआर) में आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। पेंशनर्स संगठनों का दावा है कि यह स्थिति तकनीकी व्याख्या और पुराने प्रशासनिक प्रावधानों की वजह से बनी हुई है, जिसका खामियाजा बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त कर्मचारियों और उनके आश्रितों को उठाना पड़ रहा है। उनका कहना है कि महंगाई के लगातार बढ़ते प्रभाव के बावजूद राहत की गणना और भुगतान में देरी से पेंशन की वास्तविक क्रय शक्ति घट रही है।
एमपी पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष आमोद सक्सेना के अनुसार, यह पूरा विवाद 26 साल पुराने उस नियम से जुड़ा है, जो एकीकृत मध्यप्रदेश के समय लागू हुआ था। उनका कहना है कि 1 नवंबर 2000 को राज्य विभाजन के बाद सेवानिवृत्त हुए 4.13 लाख से ज्यादा कर्मचारियों को भी सरकार उसी श्रेणी में गिन रही है, जिसमें केवल 1 नवंबर 2000 से पहले के पेंशनर्स आते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसे “पूर्व विभाजन” पेंशनर्स की संख्या एमपी और छत्तीसगढ़ मिलाकर करीब 26 हजार ही रह गई है। संगठन का आरोप है कि इस तकनीकी गणना से दोनों राज्यों की सरकारें हर महीने बड़ी राशि की बचत कर रही हैं।
पेंशन विभाग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर 2025 तक मध्यप्रदेश में कुल 4.40 लाख से अधिक पेंशनर्स दर्ज हैं। इनमें केवल लगभग 19 हजार वे हैं, जो 1 नवंबर 2000 से पहले सेवानिवृत्त हुए थे। यानी कुल संख्या का लगभग चार प्रतिशत। वहीं छत्तीसगढ़ में ऐसे पेंशनर्स की संख्या करीब 7 हजार बताई जा रही है। इस तरह दोनों राज्यों में मिलाकर इनकी संख्या 26 हजार के आसपास है और समय के साथ यह घटती जा रही है। इसके विपरीत, 96 प्रतिशत से अधिक पेंशनर्स वे हैं, जो राज्य विभाजन के बाद सेवानिवृत्त हुए।
विभाजन के बाद रिटायर हुए 4.13 लाख से अधिक कर्मचारियों को उत्तरवर्ती पेंशनर्स की श्रेणी में रखा जाता है। पेंशनर्स संगठनों का कहना है कि इन पर 30 अक्टूबर 2000 के उस एकीकृत नियम को लागू नहीं किया जा सकता, जो राज्य पुनर्गठन से पहले की परिस्थितियों के लिए था। इसके बावजूद महंगाई राहत के भुगतान में दोनों राज्यों की सहमति की शर्त जोड़ दी गई है, जिससे भुगतान की अवधि (ड्यूरेशन) में कटौती हो रही है और पेंशनरों को कम राशि मिल रही है।
होली से ठीक पहले 2 मार्च 2026 को मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 1 जनवरी 2026 से 3 प्रतिशत महंगाई राहत देने की घोषणा की। हालांकि इस ऐलान के बाद भी प्रदेश के करीब 4.40 लाख पेंशनरों में असंतोष है। पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन के संरक्षक गणेश दत्त जोशी का कहना है कि कर्मचारियों की तरह पेंशनरों को समयबद्ध राहत न देना भेदभावपूर्ण है। उनका आरोप है कि हर छह महीने में महंगाई के असर का आकलन न करना पेंशनरों के संवैधानिक अधिकारों के विपरीत है।
भोपाल जिला अध्यक्ष सुरेश शर्मा का दावा है कि दिसंबर 2025 तक 81 महीनों का एरियर लंबित रहा, जिसकी राशि का भुगतान नहीं किया गया। उनका कहना है कि महंगाई राहत की अवधि में बार-बार कटौती से पेंशनरों की आय पर सीधा असर पड़ रहा है और इससे व्यापक नाराजगी पैदा हो गई है। संगठन इसे आर्थिक अन्याय बताते हुए लंबित एरियर और नियमित डीआर भुगतान की मांग कर रहा है।
पूरा विवाद 1 नवंबर 2000 को मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के अलग-अलग राज्य बनने से जुड़ा है। विभाजन से ठीक पहले 30 अक्टूबर 2000 को मध्यप्रदेश वित्त विभाग ने एक परिपत्र जारी किया था। राज्य पुनर्गठन अधिनियम की धारा 49(6) के तहत दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों के बीच एक समझौता हुआ, जिसमें 1 नवंबर 2000 से पहले के पेंशनर्स की वित्तीय जिम्मेदारी जनसंख्या अनुपात के आधार पर बांटी गई। इसमें मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी 73.38 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ की 26.62 प्रतिशत तय की गई थी। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया था कि पेंशन भुगतान में किसी प्रकार की बाधा नहीं आएगी।
पेंशनर्स संगठनों का तर्क है कि उस सर्कुलर में 1 नवंबर 2000 के बाद सेवानिवृत्त कर्मचारियों को शामिल नहीं किया गया था। न ही उसमें महंगाई राहत को लेकर किसी प्रकार की सहमति की अनिवार्यता का उल्लेख था। उनका कहना है कि 2005 तक पेंशनरों को नियमित रूप से डीआर मिलता रहा, लेकिन 2006 में तत्कालीन मुख्य सचिव एपी श्रीवास्तव के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ की सहमति को अनिवार्य शर्त के रूप में लागू किया गया। तब से महंगाई राहत के भुगतान में देरी और कटौती का सिलसिला शुरू हुआ।
अब पेंशनर्स संगठनों की मांग है कि विभाजन के बाद सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पूर्व विभाजन नियमों से अलग रखा जाए और उन्हें केंद्र के समान समय पर पूर्ण महंगाई राहत दी जाए। उनका कहना है कि जब तक इस प्रशासनिक विसंगति को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक लाखों पेंशनर्स को हर महीने आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता रहेगा।