मध्यप्रदेश में राशन वितरण व्यवस्था को अधिक सुचारु बनाने के लिए POS मशीनों के साथ आइरिस स्कैनर आधारित प्रमाणीकरण विकल्प पर काम किया जा रहा है। यह कदम खास तौर पर उन राशन कार्डधारकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिन्हें फिंगरप्रिंट मिलान में लगातार परेशानी आती है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में पहचान सत्यापन के दौरान होने वाली तकनीकी बाधाओं को कम करना इसका मुख्य उद्देश्य है।
राज्य की उचित मूल्य दुकानों पर अब तक अधिकतर प्रमाणीकरण फिंगरप्रिंट के आधार पर होता रहा है। लेकिन कई मामलों में उम्र, श्रम आधारित काम, त्वचा की घिसावट या मशीन की गुणवत्ता जैसी वजहों से अंगूठे का मिलान नहीं हो पाता। ऐसे में पात्र हितग्राही राशन से वंचित होने की स्थिति तक पहुंच जाते हैं। आइरिस स्कैनिंग को इसी समस्या के व्यावहारिक समाधान के तौर पर देखा जा रहा है।
फिंगरप्रिंट फेल होने पर वैकल्पिक पहचान
POS मशीन में आइरिस स्कैनर जुड़ने का मतलब है कि उपभोक्ता की पहचान सिर्फ अंगूठे तक सीमित नहीं रहेगी। यदि फिंगरप्रिंट सत्यापन सफल नहीं होता, तो आंख की पुतली के स्कैन से पहचान पूरी की जा सकेगी। इससे पात्रता सत्यापन का दूसरा सुरक्षित रास्ता उपलब्ध होगा और दुकान स्तर पर प्रक्रिया बाधित नहीं होगी।
राशन वितरण के दौरान अक्सर यह शिकायत आती रही है कि तकनीकी त्रुटि के कारण कई लाभार्थियों को बार-बार दुकान के चक्कर लगाने पड़ते हैं। वैकल्पिक बायोमेट्रिक व्यवस्था लागू होने पर ऐसे मामलों में कमी आने की संभावना है। इससे दुकान संचालकों और उपभोक्ताओं, दोनों का समय बचेगा और वितरण का दैनिक प्रवाह बेहतर रहेगा।
PDS में पारदर्शिता और समयबद्ध वितरण पर जोर
सार्वजनिक वितरण प्रणाली में डिजिटल प्रमाणीकरण का उद्देश्य सिर्फ पहचान तय करना नहीं, बल्कि पारदर्शिता बनाए रखना भी है। जब मशीन स्तर पर सत्यापन की सफलता दर बढ़ती है, तो वितरण रिकॉर्ड अधिक सटीक बनता है। इससे वास्तविक हितग्राहियों तक अनाज पहुंचाने की प्रक्रिया मजबूत होती है और शिकायतों की संख्या घट सकती है।
प्रशासनिक स्तर पर इस तरह की तकनीकी व्यवस्था के साथ प्रशिक्षण और निगरानी भी जरूरी मानी जाती है। मशीन उपलब्धता, नेटवर्क स्थिति और स्थानीय स्तर पर स्टाफ की तैयारी, तीनों कारक वितरण की गुणवत्ता तय करते हैं। इसलिए आइरिस स्कैनिंग विकल्प का लाभ तभी अधिक दिखेगा, जब इसे दुकानों पर व्यवहारिक रूप से स्थिर तरीके से लागू किया जाएगा।
ग्रामीण और बुजुर्ग हितग्राहियों को संभावित फायदा
ग्रामीण इलाकों में ऐसे कई परिवार हैं, जिनके वरिष्ठ सदस्यों को पहचान सत्यापन में सबसे ज्यादा दिक्कत होती है। मजदूरी करने वाले या लंबे समय से हाथ से काम करने वाले लोगों के फिंगरप्रिंट का स्पष्ट न मिलना आम समस्या है। आइरिस आधारित प्रमाणीकरण इन समूहों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकता है।
बीते समय में फिंगरप्रिंट असफल होने की समस्या को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष और शिकायतें दर्ज होती रही हैं। अब नया विकल्प जुड़ने से तकनीकी विफलता की स्थिति में तत्काल दूसरा माध्यम उपलब्ध रहेगा। इससे मासिक राशन प्राप्ति में देरी घटेगी और लाभार्थियों की निर्भरता एक ही प्रमाणीकरण तरीके पर नहीं रहेगी।
आगे क्या बदलेगा
राज्य में POS मशीनों के साथ आइरिस स्कैनिंग विकल्प लागू होने से राशन दुकानों की कार्यप्रणाली अधिक लचीली हो सकती है। यह बदलाव वितरण तंत्र को लाभार्थी-केंद्रित बनाने की दिशा में माना जा रहा है। यदि जमीनी स्तर पर उपकरण, कनेक्टिविटी और प्रशिक्षण का संतुलन सही रहा, तो पात्र उपभोक्ताओं तक राशन पहुंचाने की प्रक्रिया अधिक नियमित और भरोसेमंद बनेगी।