एमपी में वेतन विवाद पर बढ़ी हलचल, सुप्रीम कोर्ट पहुंच सकती है सरकार, 400 करोड़ के एरियर पर संकट

मध्य प्रदेश के एक लाख से अधिक सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बार फिर अनिश्चितता की स्थिति बनती दिख रही है। प्रोबेशन अवधि में वेतन कटौती से जुड़े मामले में राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। इससे पहले मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि जिन कर्मचारियों की परिवीक्षा काल के दौरान सैलरी कम दी गई, उन्हें पूरा एरियर ब्याज सहित लौटाया जाए। अब यदि सरकार इस आदेश को चुनौती देती है, तो कर्मचारियों को मिलने वाली बड़ी राशि फिलहाल अधर में लटक सकती है।

पुरानी व्यवस्था से नई नीति तक: क्या बदला था 2019 में

2018 से पहले तक कर्मचारी चयन मंडल के माध्यम से तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों पर नियुक्त कर्मचारियों के लिए दो वर्ष का प्रोबेशन पीरियड तय था। इस दौरान उन्हें नियुक्ति के पहले दिन से ही पूर्ण वेतन दिया जाता था। लेकिन 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार ने सामान्य प्रशासन विभाग के जरिए बड़ा बदलाव किया। प्रोबेशन अवधि को बढ़ाकर चार वर्ष कर दिया गया और वेतन संरचना में संशोधन करते हुए चरणबद्ध भुगतान (स्टाइपेंड) की व्यवस्था लागू की गई।

कैसे घटाया गया वेतन: चार साल की नई संरचना

नई नीति के तहत पहले वर्ष में मूल वेतन का 70 प्रतिशत, दूसरे वर्ष में 80 प्रतिशत, तीसरे वर्ष में 90 प्रतिशत और चौथे वर्ष में 100 प्रतिशत भुगतान का प्रावधान किया गया। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि प्रोबेशन अवधि पूरी होने तक संबंधित कर्मचारी को नियमित वरिष्ठ श्रेणी का लाभ नहीं मिलेगा। कर्मचारियों का तर्क था कि उनसे पूर्ण कार्य लिया जा रहा है, फिर वेतन में कटौती अनुचित है।

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और समानता का सवाल

सरकार बदलने के बाद भी यह नियम समाप्त नहीं किया गया, जबकि चुनाव के दौरान इसे खत्म करने का वादा किया गया था। अंततः कर्मचारी संगठनों ने न्यायालय की शरण ली। मामले की सुनवाई करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच—जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस दीपक खोत—ने सरकार की नीति को भेदभावपूर्ण बताया। अदालत ने कहा कि समान कार्य के लिए असमान वेतन देना संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रभावित कर्मचारियों को पूरा वेतन और बकाया राशि (एरियर) लौटाई जाए।

एमपीपीएससी बनाम कर्मचारी चयन मंडल: सरकार का तर्क

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) का उदाहरण देते हुए कहा था कि वहां दो वर्ष का प्रोबेशन और पूर्ण वेतन की व्यवस्था है, तो कर्मचारी चयन मंडल की भर्तियों में अलग नियम क्यों? इस पर राज्य सरकार का पक्ष है कि दोनों चयन प्रक्रियाएं अलग हैं। MPPSC में प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार की बहु-स्तरीय प्रणाली होती है, जबकि कर्मचारी चयन मंडल में एकल परीक्षा के आधार पर चयन किया जाता है। सरकार इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष मजबूत करने की तैयारी कर रही है।

400 करोड़ का दांव और 1 लाख कर्मचारियों की उम्मीदें

यदि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल करती है, तो लगभग 400 करोड़ रुपये के एरियर भुगतान पर अस्थायी रोक लग सकती है। यह राशि उन करीब एक लाख कर्मचारियों से जुड़ी है, जिन्हें हाईकोर्ट के आदेश के बाद राहत की उम्मीद जगी थी। अब अंतिम निर्णय सर्वोच्च अदालत के रुख पर निर्भर करेगा। ऐसे में यह मामला केवल वित्तीय नहीं, बल्कि प्रशासनिक नीति और संवैधानिक समानता के सिद्धांत से भी जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है।