मध्यप्रदेश में गेहूं की सरकारी खरीदी की तैयारियों के बीच न्यूनतम समर्थन मूल्य और बोनस को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार ने इस सीजन के लिए गेहूं का MSP 2585 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, लेकिन कांग्रेस का कहना है कि राज्य स्तर पर घोषित बोनस बहुत कम है और इससे किसानों को अपेक्षित राहत नहीं मिलेगी।
सोमवार को मीडिया से बातचीत में कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी ने राज्य सरकार की बोनस नीति पर सवाल उठाए। उनके साथ पार्टी के मीडिया विभाग अध्यक्ष मुकेश नायक भी मौजूद रहे। पटवारी ने कहा कि राज्य सरकार ने इस बार गेहूं खरीदी पर केवल 15 रुपये बोनस घोषित किया है, जबकि पिछले साल यही बोनस 175 रुपये था।
पटवारी ने तुलना करते हुए कहा कि राजस्थान सरकार किसानों को गेहूं पर 150 रुपये बोनस दे रही है। उनके मुताबिक, यदि मध्यप्रदेश सरकार भी पिछले साल की तरह 175 रुपये बोनस दे तो किसानों को 2700 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा भुगतान सुनिश्चित किया जा सकता है। उन्होंने इस संबंध में मुख्यमंत्री को पत्र लिखने की जानकारी भी दी।
कांग्रेस का मुख्य तर्क: बोनस बढ़े तो किसानों को बेहतर भुगतान
कांग्रेस का कहना है कि MSP बढ़ना पर्याप्त नहीं है, जब तक राज्य स्तर पर प्रोत्साहन राशि व्यावहारिक न हो। पार्टी ने तर्क दिया कि किसान लागत, परिवहन और अन्य खर्चों के दबाव में हैं, इसलिए वास्तविक लाभ कीमत में राज्य बोनस की भूमिका अहम रहती है। इसी आधार पर कांग्रेस ने 15 रुपये बोनस को अपर्याप्त बताया है।
जीतू पटवारी ने सरकार से खरीदी केंद्रों की सूची जल्द सार्वजनिक करने की मांग भी रखी। उनका कहना है कि खरीदी व्यवस्था समय पर स्पष्ट नहीं होने से किसानों में असमंजस बनता है। उन्होंने समर्थन मूल्य और बोनस को लेकर सरकार से पुनर्विचार की मांग दोहराई।
“राज्य सरकार पिछले साल की तरह गेहूं पर 175 रुपये बोनस दे, तो किसानों को 2700 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक दाम सुनिश्चित हो सकते हैं।” — जीतू पटवारी
जल संसाधन विभाग के टेंडरों पर भी कांग्रेस का हमला
उसी प्रेस वार्ता में कांग्रेस ने राज्य सरकार को एक अन्य मुद्दे पर भी घेरा। मीडिया विभाग अध्यक्ष मुकेश नायक ने जल संसाधन विभाग में टेंडर प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि कमीशनखोरी और प्रतिशत तय होने की शिकायतों के कारण बीते करीब डेढ़ साल में विभाग में कोई बड़ा टेंडर नहीं हो पाया।
मुकेश नायक ने यह भी दावा किया कि कांग्रेस सरकार के समय ब्लैकलिस्ट की गई एक कंपनी अलग-अलग नामों से टेंडर प्रक्रिया में भाग ले रही है। उन्होंने 2023-24 के सभी टेंडरों की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की। कांग्रेस ने कहा कि यदि जांच होती है तो टेंडर प्रक्रिया और भुगतान से जुड़े कई तथ्य सामने आ सकते हैं।
“परसेंटेज के कारण डेढ़ साल से विभाग में एक भी बड़ा टेंडर नहीं हुआ।” — मुकेश नायक
खरीदी सीजन से पहले बढ़ा राजनीतिक दबाव
गेहूं खरीदी का समय नजदीक आने के साथ बोनस और भुगतान का मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है। राज्य सरकार की ओर से अभी तक बोनस पर कोई नया संकेत नहीं आया है, लेकिन विपक्ष इसे किसानों की आय से जोड़कर लगातार उठा रहा है। कांग्रेस का फोकस इस समय दो मांगों पर है: बोनस राशि में बढ़ोतरी और खरीदी केंद्रों की स्पष्ट सूची जारी करना।
राजनीतिक स्तर पर यह बहस केवल MSP के आंकड़े तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात पर केंद्रित है कि घोषित समर्थन मूल्य किसानों की जेब तक किस रूप में पहुंचता है। विपक्ष का तर्क है कि केंद्र का MSP और राज्य का बोनस मिलकर ही किसानों की वास्तविक बिक्री कीमत तय करते हैं। इसी कारण 15 रुपये बनाम 175 रुपये का अंतर इस बार बहस का मुख्य बिंदु बन गया है।
फिलहाल, कांग्रेस ने पत्र और प्रेस वार्ता के जरिए सरकार पर दबाव बढ़ाया है। अब निगाह इस पर रहेगी कि राज्य सरकार बोनस पर कोई संशोधन करती है या मौजूदा ढांचे के साथ ही खरीदी प्रक्रिया आगे बढ़ती है।