पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने देश की आर्थिक स्थिति पर चौंकाने वाला बयान दिया है। उन्होंने खुलकर स्वीकार किया कि विदेशों से कर्ज मांगने के लिए जब वे और आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर दुनिया भर में जाते हैं, तो शर्म से उनके सिर झुक जाते हैं।
शहबाज ने कहा है, “जब फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और मैं दुनिया भर में पैसे के लिए भीख मांगते घूमते हैं, तो हमें शर्म आती है। लोन लेना हमारे आत्म-सम्मान पर बहुत बड़ा बोझ है… शर्म से हमारे सिर झुक जाते है।
उन्होंने यह भी कहा कि कर्जदाता जो कुछ भी करवाना चाहते हैं, वे उनमें से कई बातों के लिए मना नहीं कर सकते। यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान अपनी आर्थिक वृद्धि को सहारा देने के लिए इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड के साथ बातचीत कर रहा है।
पाकिस्तान की कर्ज पर निर्भरता
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कर्ज के सहारे चल रही है। देश का विदेशी कर्ज बीते 12 सालों में दोगुना हो चुका है। पाकिस्तान लगातार IMF के सामने झोली फैलाता रहा है। एशियन डेवलपमेंट बैंक का भी पाकिस्तान पर कर्ज है।
पाकिस्तान को हाल ही में IMF से उसके चल रहे लोन कार्यक्रम और एक अलग जलवायु से जुड़े वित्तपोषण योजना के तहत 1.2 बिलियन डॉलर मिले हैं। इस फंडिंग से पाकिस्तान को कर्ज चुकाने और अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने में मदद मिली है।
औद्योगिक विकास पर जोर
शहबाज ने यह भी कहा कि उनकी सरकार ने केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय को पूंजी तक पहुंच को बेहतर बनाकर औद्योगिक विकास को समर्थन देने का निर्देश दिया है। शरीफ ने शुक्रवार को कहा कि गवर्नर को व्यापारिक नेताओं की बात सुननी होगी और बड़े फैसले लेने होंगे।
विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि
पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक ने इस सप्ताह अनुमान लगाया कि दिसंबर तक उसका विदेशी मुद्रा भंडार 20 बिलियन डॉलर से अधिक हो जाएगा। यह एक रिकॉर्ड होगा। हालांकि, इस कार्यक्रम के लिए पाकिस्तान को सख्त मौद्रिक नीति बनाए रखने और खर्च पर लगाम लगाने की जरूरत है।
ब्याज दर और महंगाई की चुनौती
स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने इस सप्ताह अप्रत्याशित रूप से ब्याज दर को 10.5 प्रतिशत पर स्थिर रखा। बैंक ने कहा कि महंगाई बढ़ सकती है। जून में खत्म होने वाले वित्तीय वर्ष में GDP 3.75 से 4.75 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान लगाया गया है।
शहबाज शरीफ का यह बयान पाकिस्तान की आर्थिक वास्तविकता को उजागर करता है। देश अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर निर्भर है और इसकी कीमत आत्म-सम्मान के साथ चुकानी पड़ रही है।