भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर अनुमान बताते हैं कि आने वाले समय में भी इसकी रफ्तार बनी रह सकती है। भले ही सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से पहले जैसी आक्रामक मदद अब धीरे-धीरे कम हो रही हो, फिर भी भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7 प्रतिशत से अधिक और कुल नाममात्र (नॉमिनल) जीडीपी ग्रोथ करीब 10 प्रतिशत रहने की संभावना जताई जा रही है।
आकलन के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भी वास्तविक जीडीपी ग्रोथ 7 प्रतिशत से ऊपर रह सकती है, जबकि कुल जीडीपी ग्रोथ 10 प्रतिशत से थोड़ा अधिक हो सकती है। इसके पीछे वजह यह मानी जा रही है कि वैश्विक चुनौतियां पहले की तुलना में कम हो रही हैं और टैरिफ से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय समझौतों से विकास को समर्थन मिल सकता है।
महंगाई काबू में, ब्याज दरों में और कटौती की गुंजाइश
सिटी इंडिया के मुख्य अर्थशास्त्री समीरन चक्रवर्ती का मानना है कि पूरे साल औसतन महंगाई करीब 3.8 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। यदि महंगाई इसी दायरे में रहती है, तो आगे चलकर ब्याज दरों में कुछ और कटौती की गुंजाइश बन सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रिजर्व बैंक द्वारा राहत का समय और मात्रा नए जीडीपी व महंगाई आंकड़ों के साथ-साथ रुपये की चाल पर निर्भर करेगी।
GDP ग्रोथ और शेयर बाजार की कमाई में अंतर
मजबूत आर्थिक आंकड़ों के बावजूद शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों की कमाई में उतनी तेजी नहीं दिख रही है। इस अंतर को समझाते हुए समीरन चक्रवर्ती ने कहा कि देश की कुल खपत में अब सेवाओं की हिस्सेदारी 60 से 80 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। इसके साथ ही ग्रामीण मांग शहरी क्षेत्रों की तुलना में बेहतर स्थिति में बनी हुई है। उन्होंने यह भी बताया कि कई गैर-सूचीबद्ध कंपनियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं, जबकि शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों में इसका असर सीमित नजर आ रहा है। इसी कारण GDP के आंकड़े मजबूत हैं, लेकिन सूचीबद्ध कंपनियों की आय में वैसी छलांग नहीं दिख रही।
आगे कमाई में सुधार की उम्मीद
चक्रवर्ती के अनुसार, अगर कुल नॉमिनल GDP ग्रोथ लगभग 10 प्रतिशत तक पहुंचती है, तो इसका असर अंततः कंपनियों की कुल कमाई पर भी दिखना चाहिए। उनका मानना है कि GDP और कॉरपोरेट अर्निंग्स के बीच जो अंतर फिलहाल दिखाई दे रहा है, वह आने वाले समय में धीरे-धीरे कम हो सकता है।
रुपये की स्थिति में सुधार के संकेत
रुपये को लेकर भी आउटलुक पहले से बेहतर बताया जा रहा है। चक्रवर्ती का कहना है कि भारत का बैलेंस ऑफ पेमेंट्स घाटे से निकलकर सरप्लस की ओर बढ़ सकता है। सिटी के अनुमान के मुताबिक चालू खाता घाटा GDP का करीब 0.5 प्रतिशत रह सकता है और जनवरी-मार्च तिमाही में ही बैलेंस ऑफ पेमेंट्स सरप्लस में आ सकता है। इससे रुपये को समर्थन मिलने की संभावना है।
2026 में रुपये पर क्या रहेगा असर
हाल के समय में महंगाई के अंतर का रुपये पर ज्यादा असर नहीं दिखा है, लेकिन अगले साल तस्वीर बदल सकती है। सिटी का अनुमान है कि रुपया करीब 91 के स्तर के आसपास बना रह सकता है, यानी 2025 में जो कमजोरी देखने को मिली थी, वह 2026 में दोहराए जाने की संभावना कम है।
समीरन चक्रवर्ती के अनुसार, रिजर्व बैंक को सिर्फ ब्याज दरों में कटौती की संख्या पर ध्यान देने के बजाय वित्तीय हालात को सहज बनाए रखने पर ज्यादा फोकस करना चाहिए। इसके लिए उन्होंने ओपन मार्केट ऑपरेशंस जैसे कदमों के जरिए लिक्विडिटी बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया।