प्रकाश पुरोहित
वरिष्ठ पत्रकार एवं व्यंग्यकार
आप इंडिया से हैं…?’’
हां…!’’
क्या मैं आपको छू लूं?’’
क्यों, क्या बात है?’’
दरअसल, मैंने आज तक कोई इंडियन’ नहीं देखा है…।’’
तो फिर गले लग ले यार…।’’
लाहौर के बाजार में घूमते हुए करीब सत्रह साल का युवक मिला था। तब भारत की क्रिकेट टीम करीब तेरह साल बाद पाकिस्तान ( Pakistan ) गई थी खेलने, तभी कुछ हिंदुस्तानी वहां क्रिकेट के बहाने जा पाए थे। इस युवक के लिए किसी इंडियन को देखना ही अचंभा था। ऐसे ना जाने कितने किस्से उन दिनों यहां-वहां हो रहे थे।
Pakistan में एक जैसा अनुभव था
हर भारतीय का पाकिस्तान ( Pakistan ) में अलग मगर एक जैसा अनुभव था कि दिल से चाहते हैं और मेहमानदारी में कसर नहीं छोड़ते। शायद ही कोई भारतीय होगा, जिसकी आंख नम नहीं हुई हो। आम लाहौरी पठानी सूट में ही नजर आते हैं; भारतीय की पहचान ही पेंट-शर्ट होती है, वरना तो कोई फर्क नहीं है। कपड़े से पहचान यहां भी है और वहां भी, मगर नजरिए का फर्क है! लाहौर हवाई अड्डे पर बैठा था, कराची की उड़ान का इंतजार था। तभी पास बैठे शख्स ने पूछा क्या फैज साहब के फेन हैं आप भी?’’ टाइम पास के लिए अनजाने में आए कुछ अब्र, कुछ शराब आए’ गुनगुना रहा था कि उनके कान ने सुर पकड़ लिए। ये खलील हुसैन थे, जो कराची ही जा रहे थे।
दुनिया में ऐसी कौन-सी जगह है, जहां फैज साहब के दीवाने नहीं हैं’’ मैंने कहा तो फिर उन पर ही बातें शुरू हो गईं। तभी फ्लाइट अनाउंस हो गई। खलील मियां तेजी से उठे और चले गए, लेकिन थोड़ी देर में क्या देखता हूं कि मोटी-सी किताब लिए दौड़े चले आ रहे हैं हांफते हुए ये फैज साहब का दीवान है…, अपने इस पाकिस्तानी भाई की तरफ से मंजूर करें’’ कहते हुए दस्तखत किए, अपना पता लिखा और मुझे दे दी। किताब के पन्ने पलटते हुए मैं यह भी नहीं कह सका कि मुझे उर्दू नहीं आती, क्योंकि प्रेम की भाषा तो समझ आ रही थी। भारत लौट कर जब उर्दू दां दोस्त से बात की तो फैज साहब का वह दीवान आज भी ना जाने किसके हाथ में होगा,क्योंकि नायाब था और उर्दू जानने वालों की कमी नहीं है। इस हाथ से उस हाथ पढ़ा जा रहा है और मुझे वापसी का इंतजार भी नहीं है!मुझसे अकसर यह पूछा जाता रहा कैसा लग रहा है पाकिस्तान?’’ तो मेरा यही जवाब होता था घर जैसा!’’ कुछ भी तो अलग नहीं है। उस समय वहां के बाजार में भारतीय फिल्मों के ही गीत बज रहे थे और टीवी भी हमारे ही दम से चल रहे थे। हमारी फिल्में हमसे ज्यादा देखते हैं पाकिस्तानी। और तो और, जगह-जगह पोस्टर भी सनी देओल, संजय दत्त, सचिन तेंडुलकर और ऐश्वर्य राय के नजर आते थे। वहां भटकते हुए यह याद ही नहीं रहता था कि हम किसी और देश में हैं, क्योंकि सभी कुछ तो अपने जैसा है। सीमा भले ही सियासत ने खींच दी हो, उससे कुछ बदल थोड़े ही जाता है।
कैसेट्स का दौर था और यही हसरत थी कि यहां से ज्यादा से ज्यादा म्यूजिक कैसेट्स खरीद ली जाए। मुश्किल यह पेश आती थी कि जब दुकानदार से दाम पूछता तो सभी का लगभग यही जवाब होता जो मुनासिब समझें दे दें।’’ अब बताइए, मुनासिब का फैसला हो तो कैसे! आप कितना भी ज्यादा दें, लगता था कम दिए, और वे बगैर गिने रख लेते थे।करीब एक माह रहा कराची, रावलपिंडी, पेशावर, इस्लामाबाद और लाहौर में।
लाहौर में लतीफ मियां से दोस्ती हो गई, टैक्सी ड्राइवर थे। पहले ही दिन साथ हो लिए तो आखरी दिन हवाई अड्डे पर ही छोड़ा। करीब सात दिन लाहौर में रहा, मगर लतीफ मियां ने कभी पैसे नहीं लिए ले लूंगा हुजूर, पैसे कहां भागे जा रहे हैं।’’
चाचा, कुछ कपड़े ड्राय-क्लीन करवाने हैं।’’
हो जाएंगे हुजूर, मुझे दे दीजिए।’’दो रोज बाद लतीफ मियां कपड़े ले कर आए तो देखता ही रह गया, क्या तो धुलाई और क्या कडक़ इस्त्री। चाचा, कितने पैसे हुए?’’ काहे के पैसे हुजूर, घर पर हमारे भी कपड़े धुलते हैं, आपके भी धुल गए।’’ घर लौटने के बाद कई महीनों तक उन कडक़ प्रेसबंद कपड़ों की तह भी नहीं खोल पाया था कि लाहौर की खुशबू आती थी उनसे!आखिरी मैच था भारत-पाकिस्तान के बीच लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम में। स्टेडियम जा रहा था तो देखा टैक्सी में मिठाई का डिब्बा रखा है!लतीफ मियां… ये मिठाई कहां ले जा रहे हैं…?’’ मैंने यूं ही चुहलवाले अंदाज में पूछ लिया।हुजूर मैच के बाद खाएंगे…।’’ लतीफ मियां ने कहा! तो आपको यकीन है आज पाकिस्तान जीतेगा?’’मैंने पूछा।ये कब कहा मैंने! इंडिया जीता या पाकिस्तान… हम तो जीत की मिठाई खाएंगे… किसी की हार की थोड़े ही! पीठ भी अपनी है और पेट भी अपना है… सियासत ने सरहदें भले ही खींच दी हों… पर आज भी आम पाकिस्तानी का दिल इंडिया के नाम पर यूं धडक़ने लगता है, जैसे महबूब का नाम ले लिया हो। भारत-पाकिस्तान नहीं… आज तो हम जीतेंगे… इसीलिए मैच के बाद मिठाई खाएंगे… और खिलाएंगे।’’ लतीफ मियां ने कहा तो सही में मुंह मीठा हो गया!जब इंदौर में दोस्तों ने पूछा कैसा लगा पाकिस्तान?’’ तब यही जवाब होता था लगता है अब मैं हाजी हो गया हूं’’, अपने अपने हज होते हैं। आज ये बातें इसलिए याद आ रही हैं कि नेटफ्लिक्स पर पिछले हफ्ते द ग्रेटेस्ट राइवलरी भारत-पाकिस्तान’ डॉक्यूमेंट्री रिलीज हुई है। यह उसी समय के दौरे की है, जब भारत की क्रिकेट टीम तेरह साल बाद पाकिस्तान खेलने गई थी। हर एक के मन में डर था, लेकिन देखते ही देखते डर तो ना जाने कहां काफूर हो गया और हर दिन का दर्द ऐसा साथ लगा कि आज भी याद कर आंख भीगने लगती हैं। शायद ही कोई रोज ऐसा रहा हो, जब रोए न हों। गुरुद्वारा पंजा साहब जाने का वीजा नहीं था हमारे पास, लेकिन चले गए तो पुलिस का सिपाही वहां तैनात था। मैं तो कुछ नहीं करूंगा, लेकिन कोई अफसर आ गया तो कुछ नहीं कर पाऊंगा, आप जल्दी से वापस चले जाएं तो बेहतर रहेगा।’’ पानी की बोतल देते हुए उसने प्यार से समझाया था। कहते हैं, जिसने लाहौर नहीं देखा, वह जन्मा ही नहीं। यह एहसास भी हमेशा मेरे साथ रहता है कि मैं जन्मा हूं कि मैंने लाहौर देखा है।’